CBN36 बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने जमानत बांड भरने के बाद भी रिहाई में देरी को अवैध हिरासत बताते हुए पांच लाख रुपये मुआवजे की मांग करने वाले सरगुजा निवासी की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि उसकी हिरासत बिना कानूनी अधिकार या दुर्भावनापूर्ण तरीके से की गई थी, इसलिए मुआवजा देने का कोई आधार नहीं बनता।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने उत्तर छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के बतौली निवासी जामुना प्रसाद गुप्ता की अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।
मामले के अनुसार, 22 सितंबर 2021 को पुलिस ने जामुना प्रसाद गुप्ता को सीआरपीसी की धारा 151, 107 और 116 के तहत कार्यपालिक दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने उसी दिन जमानत बांड जमा कर दिया था, लेकिन उसे 24 सितंबर तक रिहा नहीं किया गया। बाद में जमानत बांड स्वीकार होने के बाद उसकी रिहाई हुई।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह निर्दोष था और अनावश्यक हिरासत के कारण उसे मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा तथा उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचा। इसी आधार पर उसने पांच लाख रुपये क्षतिपूर्ति की मांग की थी।
जिला न्यायालय ने 28 फरवरी 2025 को उसकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका कि पुलिस की कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण थी या उसकी हिरासत अवैध थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस द्वारा पैसे मांगने का आरोप भी किसी प्रमाण से पुष्ट नहीं किया गया।
पूर्व न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि केवल रिहाई में देरी होने से अवैध हिरासत सिद्ध नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकारों के वास्तविक उल्लंघन के बिना क्षतिपूर्ति नहीं दी जा सकती। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने पांच लाख रुपये मुआवजे की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
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