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June 5, 2026 6:00 pm

विश्व पर्यावरण दिवस बदलते पर्यावरणीय परिदृश्य में हमारी जिम्मेदारियाँ और आवश्यकताएँ

वर्धा ।प्रत्येक वर्ष हम 5 जून को समूचे विश्वभर में विश्व पर्यावरण दिवस मानतें है। इसकी शुरुआत वर्ष 1972 में यूनाइटेड नेशंस द्वारा आयोजित यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस आन द ह्यूमन एनवायरमेंट के बाद हुई थी। इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना और पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग को प्रोत्साहित करना है। आज जब जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, वायु प्रदूषण, जल संकट, जैव विविधता का ह्रास और प्लास्टिक प्रदूषण जैसी समस्याएँ मानव अस्तित्व के लिए चुनौती बन चुकी हैं तब विश्व पर्यावरण दिवस का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।
वर्तमान समय में भारत सहित पूरा विश्व अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकटों का सामना कर रहा है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बन गया है। गुजरे कुछ वर्षों में वैश्विक तापमान में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार वर्ष 2024 वैश्विक स्तर पर अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है, जबकि 2025 और 2026 में भी तापमान सामान्य से अधिक बना हुआ है। औद्योगिक क्रांति से पूर्व की तुलना में पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.3 से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चली गई, तो इसके गंभीर और स्थायी परिणाम सामने आ सकते हैं। वहीं भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। वर्ष 2025 में देश के कई हिस्सों में तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश और बिहार सहित अनेक राज्यों में लू (हिटवेव) के कारण जनजीवन प्रभावित हुआ। कई क्षेत्रों में जलस्रोत सूखने लगे तथा बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई।
आगे अगर हम बात करें वायु प्रदूषण की तो वह भी एक गंभीर चुनौती बन कर उभर आया है। वायु प्रदूषण आज विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 70 लाख (7 मिलियन) लोगों की मृत्यु वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण हो रही है। भारत के अनेक शहर लगातार दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल होते जा रहें हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआँ, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल, कृषि अवशेषों का दहन तथा जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग इसके प्रमुख कारण हैं। वायु प्रदूषण न केवल श्वसन रोगों को बढ़ा रहा है, बल्कि हृदय रोग, कैंसर और मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। अब अगर हम जल से संबंधित मुद्दों पर बात करें तो धरती की सतह का लगभग 71 प्रतिशत भाग जल से ढका है किंतु इसमें से केवल 2.5 प्रतिशत जल ही मीठा (पीने योग्य) है। इस मीठे जल का भी अधिकांश भाग हिमनदों और बर्फ के रूप में मौजूद है। परिणामस्वरूप मानव उपयोग के लिए उपलब्ध जल की मात्रा सीमित है।
भारत विश्व की लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या का घर है, जबकि उसके पास वैश्विक मीठे जल संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध है। बढ़ती जनसंख्या, अनियंत्रित भूजल दोहन, नदियों का प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जल संकट को और गंभीर बना रहे हैं।
देश की अनेक नदियाँ औद्योगिक कचरे, सीवेज और प्लास्टिक अपशिष्ट के कारण प्रदूषित हो रही हैं। यदि जल संरक्षण और जल प्रबंधन पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में पेयजल संकट और गंभीर हो सकता है।
मानव सभ्यता के अंतर्गत हम ने खुद के लिए भी एक बड़ी चुनौती प्लास्टिक को ढूंढ निकाला है जिसका हमारे जीवन में भरपूर योगदान है वहीं यह आज पर्यावरण के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। विश्व स्तर पर प्रतिवर्ष लगभग 40 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। इसका एक बड़ा हिस्सा पुनर्चक्रित नहीं हो पाता और नदियों, समुद्रों तथा भूमि पर जमा हो जाता है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार हर वर्ष लगभग 1.1 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा समुद्रों में पहुँचता है। इससे समुद्री जीवों, पक्षियों और पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान होता है। माइक्रोप्लास्टिक अब भोजन, पेयजल और यहाँ तक कि मानव रक्त में भी पाया जाने लगा है। एकल-उपयोग प्लास्टिक के उपयोग को कम करना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
इन समस्त सवालों और संकटों से निपटने का फिलहाल हमारे पास कोई ठोस हल नही परन्तु अगर हम जैव विविधता के संरक्षण को लेकर कठोर कदम उठाएं तो कुछ हद तक हम मानव जाति की सांसों अपने वारिसों के लिए सहेज सकतें हैं। पृथ्वी पर मौजूद पौधे, जीव-जंतु और सूक्ष्मजीव मिलकर जैव विविधता का निर्माण करते हैं। यही जैव विविधता मानव जीवन, कृषि, औषधि, खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिक संतुलन का आधार है।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर की रेड लिस्ट के अनुसार हजारों प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही हैं। वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक आवासों के विनाश के कारण अनेक जीव-जंतु तेजी से समाप्त हो रहे हैं।
भारत के पास विश्व की कुल भूमि का केवल लगभग 2.4 प्रतिशत क्षेत्रफल है, लेकिन यहाँ विश्व की लगभग 8 प्रतिशत जैव विविधता पाई जाती है। इसलिए भारत की भूमिका वैश्विक जैव विविधता संरक्षण में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की चरम घटनाएँ बढ़ रही हैं। कहीं अत्यधिक वर्षा और बाढ़ आ रही है तो कहीं सूखा और जल संकट बढ़ रहा है। हिमालयी हिमनदों के पिघलने की गति तेज हो रही है, जिससे भविष्य में नदियों के प्रवाह और जल उपलब्धता पर प्रभाव पड़ सकता है।
भारत में चक्रवातों की तीव्रता, गर्मी की लहरों और अनियमित मानसून की घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है। इससे कृषि उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। किसानों को बदलती जलवायु के अनुरूप कृषि तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता है।
आज पर्यावरण संरक्षण के लिए केवल नीतियाँ बनाना पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना भी आवश्यक है। जिसके तहत अधिक से अधिक वृक्ष लगाना तथा मौजूदा वनों की रक्षा करना आवश्यक है। वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में सहायता करते हैं।
वर्षा के जल का संचयन, तालाबों का पुनर्जीवन, जल पुनर्चक्रण तथा भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। ऊर्जा के प्राकृतिक श्रोत जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जैव ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए। हालांकि भारत ने वर्ष 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित किया है। कपड़े, जूट और अन्य पर्यावरण-अनुकूल उपलब्ध विकल्पों को अपनाकर प्लास्टिक पर निर्भरता कम की जानी चाहिए। अनावश्यक संसाधन उपभोग को कम करना तथा “कम उपयोग करें, पुनः उपयोग करें और पुनर्चक्रण करें” (Reduce, Reuse, Recycle) की अवधारणा को अपनाना बेहद आवश्यक है। हमारा देश नौजवानों के देश है यहां के समस्त स्कूलों महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए ताकि नई पीढ़ी पर्यावरण के प्रति अधिक जागरूक बन सके।
भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। पर्यावरण संरक्षण में युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सोशल मीडिया, तकनीक, नवाचार और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से युवा पर्यावरण संरक्षण के अभियान को जन-आंदोलन का रूप दे सकते हैं। युवा वृक्षारोपण, जल संरक्षण, स्वच्छता अभियान, प्लास्टिक मुक्त अभियान तथा स्थानीय पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान में सक्रिय भागीदारी निभा सकते हैं। विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि मानवता को अपनी जिम्मेदारियों का स्मरण कराने वाला अवसर है। आज पृथ्वी अभूतपूर्व पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है। बढ़ता तापमान, प्रदूषण, जल संकट, जैव विविधता का ह्रास और प्लास्टिक कचरा हमारे भविष्य के लिए गंभीर खतरे हैं।
यदि हम अभी से पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाते, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि सरकार, उद्योग, वैज्ञानिक समुदाय और आम नागरिक मिलकर पर्यावरण संरक्षण को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं।
विश्व पर्यावरण दिवस 2026 का संदेश स्पष्ट है, “प्रकृति की रक्षा ही मानवता की सुरक्षा है।” पृथ्वी हमारे पूर्वजों की विरासत ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। इसे सुरक्षित रखना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

(लेखक माधवी बा. धुर्वे कार्यकारी प्राचार्य
श्री. बी. के. समाजकार्य महाविद्यालय, देवळी (वर्धा) महाराष्ट्र)

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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