वर्धा । भारत आज वैश्विक स्तर पर तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अंतरिक्ष, डिजिटल तकनीक और विभिन्न विकास क्षेत्रों में देश नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। हालांकि सामाजिक स्तर पर कई चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। स्वतंत्र पत्रकार प्रिया पाण्डेय ने अपने लेख में कहा है कि आर्थिक और तकनीकी प्रगति के साथ सामाजिक सोच में बदलाव भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि दहेज प्रथा, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, सामाजिक पूर्वाग्रह और रिश्तों में बढ़ता अविश्वास आज भी समाज के सामने गंभीर समस्याओं के रूप में मौजूद हैं। उनके अनुसार आधुनिकता केवल बाहरी विकास से नहीं बल्कि विचारों, व्यवहार और मानवीय मूल्यों से परिलक्षित होती है।
लेख में बढ़ती संवेदनहीनता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया है कि सोशल मीडिया ने लोगों को जोड़ने का कार्य तो किया है, लेकिन कई बार सामाजिक जिम्मेदारियों से दूरी भी बढ़ाई है। कई गंभीर घटनाओं पर कुछ समय चर्चा होती है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में अपेक्षित प्रयास दिखाई नहीं देते।
दहेज प्रथा पर चर्चा करते हुए लेखिका ने कहा कि देश में इसके विरुद्ध कानून मौजूद होने के बावजूद दहेज उत्पीड़न और दहेज हत्या जैसी घटनाएं सामने आती रहती हैं। उन्होंने इसे केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक विफलता बताया। उनके अनुसार विवाह को लेन-देन का माध्यम नहीं बल्कि समानता और सम्मान पर आधारित संबंध के रूप में देखा जाना चाहिए।
लेख में “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि केवल शिक्षा प्रदान करना पर्याप्त नहीं है। बेटियों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता, समान अवसर और सम्मानजनक जीवन का अधिकार भी मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर आज भी महिलाओं को अपने अधिकारों और सपनों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
प्रिया पाण्डेय ने समाज में मौजूद एक विरोधाभास की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि अधिकांश परिवार शिक्षित और आत्मनिर्भर बहू की अपेक्षा करते हैं, लेकिन जब महिलाएं अपने अधिकारों और निर्णयों में भागीदारी की बात करती हैं तो कई बार उन्हें आलोचना का सामना करना पड़ता है। उनके अनुसार शिक्षित महिलाओं को समान अधिकारों वाले नागरिक के रूप में स्वीकार करना वास्तविक प्रगति का संकेत होगा।
रिश्तों में बढ़ते अविश्वास पर उन्होंने कहा कि बदलती जीवनशैली, आर्थिक दबाव, सामाजिक तुलना और डिजिटल प्रभाव के कारण पारिवारिक एवं सामाजिक संबंध प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में संवाद, पारदर्शिता और पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
लेख में यह भी कहा गया है कि किसी भी सामाजिक घटना के बाद केवल दोषियों की पहचान करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों का भी विश्लेषण होना चाहिए जो ऐसी घटनाओं को जन्म देती हैं। शिक्षा, पारिवारिक संस्कार और सामाजिक मूल्यों की भूमिका पर गंभीर विचार करने की जरूरत बताई गई है।
उन्होंने कहा कि महिलाओं और पुरुषों के बीच पक्ष-विपक्ष की बहस के बजाय न्याय और अन्याय के आधार पर समाज को विचार करना चाहिए। किसी भी व्यक्ति के साथ अन्याय होने पर उसे निष्पक्ष न्याय मिलना आवश्यक है।
लेखिका ने सामाजिक परिवर्तन के लिए परिवार स्तर से पहल करने का आह्वान किया। उन्होंने बेटों को महिलाओं के सम्मान का संस्कार देने, बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने, दहेज प्रथा का सामाजिक बहिष्कार करने तथा रिश्तों में विश्वास और संवाद को मजबूत करने पर बल दिया।
निष्कर्ष में उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी अर्थव्यवस्था या तकनीकी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसके सामाजिक मूल्यों में निहित होती है। एक आधुनिक और न्यायपूर्ण भारत के निर्माण के लिए महिलाओं की सुरक्षा, समान सम्मान, निष्पक्ष न्याय और मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
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