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April 29, 2026 7:37 pm

हरी खाद से बढ़ेगा उत्पादन, मिट्टी की सेहत होगी बेहतर

(धनंजय राठौर संयुक्त संचालक, जनसंपर्क)

रायपुर, 29 अप्रैल 2026।वर्तमान समय में टिकाऊ खेती को अपनाना अत्यंत आवश्यक हो गया है। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से प्रभावित होती मिट्टी की सेहत को सुधारने के लिए हरी खाद एक प्रभावी और प्राकृतिक विकल्प के रूप में सामने आई है। यह न केवल फसलों की उत्पादकता बढ़ाती है, बल्कि भूमि की उर्वरता को दीर्घकाल तक बनाए रखने में भी सहायक है। मिट्टी सुरक्षित रहेगी तो किसान भी सुरक्षित रहेगा, और किसान की समृद्धि से ही देश की प्रगति संभव है।

कृषि विभाग द्वारा किसानों को हरी खाद के उपयोग के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि हो और उत्पादन बेहतर हो सके। विभाग के अनुसार धान की खेती में रासायनिक उर्वरकों के निरंतर उपयोग से मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता घट रही है, जिससे मिट्टी की संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

क्या है हरी खाद?

हरी खाद ऐसी सहायक फसल होती है, जिसे मुख्य फसल की बुवाई से पहले खेत में उगाकर फूल आने की अवस्था में ही मिट्टी में मिला दिया जाता है। ढैंचा, सनई, लोबिया, मूंग और उड़द जैसी फसलें हरी खाद के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं। इसके अलावा झाड़ियों और पेड़ों की पत्तियों व टहनियों का भी उपयोग किया जा सकता है, हालांकि ढैंचा और सनई का प्रयोग अधिक प्रभावी माना जाता है।

मिट्टी की सेहत में सुधार

हरी खाद का सबसे बड़ा लाभ मिट्टी की भौतिक एवं रासायनिक संरचना में सुधार के रूप में देखा जाता है। यह मिट्टी में नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थ (ह्यूमस) की मात्रा बढ़ाती है। इसके उपयोग से मिट्टी भुरभुरी बनती है, जिससे वायु संचार बेहतर होता है और पौधों की जड़ें गहराई तक विकसित हो पाती हैं। साथ ही, मिट्टी की जल धारण क्षमता भी बढ़ती है, जो सूखे की स्थिति में फसलों के लिए लाभकारी होती है।

उत्पादन में वृद्धि, लागत में कमी

स्वस्थ मिट्टी बेहतर उत्पादन की आधारशिला होती है। हरी खाद के प्रयोग से फसल उत्पादन में लगभग 15 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है। इसके उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है, जिससे खेती की लागत घटती है। साथ ही, यह लाभकारी सूक्ष्मजीवों और केंचुओं की संख्या बढ़ाकर भूमि की जैविक गुणवत्ता को भी सुदृढ़ करती है।

हरी खाद तैयार करने की विधि

स्थानीय जलवायु के अनुसार सनई या ढैंचा का चयन करें। इसकी बुवाई के लिए मानसून की शुरुआत (जून-जुलाई) उपयुक्त समय होता है। जब फसल 40 से 50 दिन की हो जाए और उसमें फूल आने लगें, तब उसे हल, पाटा या रोटावेटर की सहायता से मिट्टी में मिला दें। इसके बाद 10 से 15 दिनों तक खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखें, ताकि हरी खाद सड़कर अच्छी तरह मिट्टी में मिल जाए।

आय में वृद्धि का माध्यम

हरी खाद केवल उर्वरक नहीं, बल्कि मिट्टी के उपचार का एक प्रभावी माध्यम है। यदि किसान प्रत्येक दो से तीन वर्ष में इसका उपयोग करें, तो उनकी आय में वृद्धि के साथ-साथ रसायन मुक्त, पौष्टिक और सुरक्षित अनाज का उत्पादन संभव हो सकेगा।

कृषि के लिए वरदान

वर्तमान समय में रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है। ऐसे में हरी खाद प्राकृतिक रूप से मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सरल और किफायती उपाय है।

कृषि विभाग द्वारा खरीफ फसल से पूर्व हरी खाद के बीज उपलब्ध कराने की पहल भी की जा रही है। इसके तहत ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारियों के माध्यम से किसानों की मांग के अनुसार बीज वितरण की व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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