रायपुर, 28 अप्रैल 2026। दंतेवाड़ा जिले में दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में हो रही उल्लेखनीय वृद्धि बस्तर संभाग में एक नई ‘श्वेत क्रांति’ का संकेत दे रही है। कभी संघर्षों के लिए पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र में अब पशुपालन और डेयरी व्यवसाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनते जा रहे हैं। राज्य सरकार के प्रयासों से किसानों की आय में वृद्धि हो रही है, वहीं यह पहल कुपोषण के विरुद्ध भी प्रभावी साबित हो रही है।
मजदूरी से सफलता तक का सफर

गीदम विकासखंड के ग्राम गुमड़ा निवासी 36 वर्षीय ललित यादव ने संघर्षों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है। वर्ष 2013 में मात्र 6 गायों से डेयरी की शुरुआत करने वाले ललित के पास आज 25 उन्नत नस्ल की गायों वाला आधुनिक डेयरी फार्म है। कभी मजदूरी करने वाले ललित अब एक सफल उद्यमी के रूप में उभरे हैं।
तकनीक और उन्नत नस्लों का योगदान

पशुपालन विभाग के मार्गदर्शन में ललित ने जर्सी और एचएफ क्रॉस नस्लों को अपनाया। वर्तमान में उनके फार्म से प्रतिदिन 70 से 80 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है, जो लगभग 70 रुपये प्रति लीटर की दर से बाजार में बिकता है। चारे की समस्या के समाधान के लिए उन्होंने नेपियर घास की खेती शुरू की, जिससे लागत में कमी आई है।
मल्टी-फार्मिंग से बढ़ी आय

ललित ने डेयरी के साथ कुक्कुट पालन और सब्जी उत्पादन को जोड़कर आय के कई स्रोत विकसित किए हैं। अतिरिक्त दूध से पनीर बनाकर वे लगभग 400 रुपये प्रति किलो की दर से बिक्री कर रहे हैं। इसके अलावा, उनके फार्म से तैयार जैविक खाद की भी काफी मांग है, जिसे अन्य जिलों के किसान खरीदने पहुंचते हैं।
शासन की योजनाओं का मिला सहारा
डेयरी शेड और फेंसिंग के लिए लिए गए 3 लाख रुपये के बैंक ऋण को समय से पहले चुकाकर ललित ने अपनी वित्तीय अनुशासन का परिचय दिया है। उनकी सफलता में सरकारी योजनाओं और प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
संघर्ष से प्रेरणा तक
ललित अपनी सफलता का श्रेय अपनी माता को देते हैं, जिन्होंने आंगनबाड़ी सहायिका के रूप में कार्य करते हुए विपरीत परिस्थितियों में उन्हें शिक्षित किया। आज ललित न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुके हैं।ललित यादव की कहानी इस बात का उदाहरण है कि सही मार्गदर्शन, मेहनत और नवाचार से ग्रामीण क्षेत्रों में भी समृद्धि की नई राह बनाई जा सकती है।
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