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August 13, 2026 8:21 pm

मोक्षित कॉर्पोरेशन की याचिका हाई कोर्ट ने खारिज, ईडी की 80 करोड़ की कुर्की को दी थी चुनौती

CBN36 बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने मोक्षित कॉर्पोरेशन और अन्य की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत की गई करीब 80.36 करोड़ रुपये की अनंतिम कुर्की को चुनौती दी गई थी। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने कहा कि पीएमएलए में कुर्की आदेश को चुनौती देने के लिए प्रभावी और पूर्ण वैधानिक व्यवस्था उपलब्ध है। ऐसे में असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर सीधे हाई कोर्ट में रिट याचिका दाखिल नहीं की जा सकती।

ईडी ने 46 संपत्तियां की हैं कुर्क

ईडी ने 13 मार्च 2026 को पीएमएलए की धारा 5(1) के तहत अनंतिम कुर्की आदेश जारी किया था। इसके तहत करीब 80.36 करोड़ रुपये मूल्य की 46 चल-अचल संपत्तियां कुर्क की गई थीं। इसके बाद ईडी ने अधिनिर्णयन प्राधिकरण के समक्ष शिकायत पेश की और पीएमएलए की धारा 8 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी किया।

मोक्षित कॉर्पोरेशन छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड को मेडिकल उपकरण और उपभोग्य सामग्री की आपूर्ति करती है।

कंपनी ने कहा- वैध कारोबारी मुनाफे को अपराध की आय माना

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने कोर्ट में तर्क दिया कि कंपनी को टेंडर के तहत प्राप्त वैध कारोबारी मुनाफे को ईडी ने गलत तरीके से अपराध से अर्जित आय मान लिया है। ईडी ने लागत, टैक्स और अन्य वैध कारोबारी खर्चों को भी उचित रूप से ध्यान में नहीं रखा।

पहले अधिनिर्णयन प्राधिकरण में उठानी होगी आपत्ति

हाई कोर्ट ने कहा कि पीएमएलए के तहत कुर्की की वैधता पर निर्णय के लिए पहले अधिनिर्णयन प्राधिकरण के समक्ष धारा 8 के तहत कार्यवाही का प्रावधान है। इसके बाद धारा 26 के तहत अपीलीय न्यायाधिकरण और धारा 42 के तहत हाई कोर्ट में अपील का रास्ता उपलब्ध है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब प्रभावी वैधानिक उपाय उपलब्ध हो, तब हाई कोर्ट को सामान्यतः जांच या कारण बताओ नोटिस के स्तर पर हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

असाधारण परिस्थिति का आधार नहीं मिला

हाई कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई असाधारण आधार स्थापित नहीं कर सके, जिससे वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल किया जा सके। कोर्ट ने कहा कि यदि अधिकार क्षेत्र का पूर्ण अभाव या प्राकृतिक न्याय के गंभीर उल्लंघन जैसी परिस्थितियां होतीं तो स्थिति अलग हो सकती थी।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

अधिनिर्णयन प्राधिकरण के सामने पक्ष रखने की छूट

हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को राहत देते हुए स्पष्ट किया कि वे पीएमएलए के तहत सक्षम अधिनिर्णयन प्राधिकरण के समक्ष अपने सभी कानूनी और तथ्यात्मक तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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