(निशीथ राय, संकाय सदस्य, मानवविज्ञान विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा)
वर्धा महाराष्ट्र ।आज 23 मार्च 2026 है। तारीख वही है जब 1931 में लाहौर की जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने फांसी के फंदे को चूमा था। आज उनकी शहादत का दिन है । पूरा देश उन्हें सलाम कर रहा है। इस अवसर पर हम उस ऐतिहासिक घटनाक्रम को याद कर सकते हैं, जो उसी जगह लाहौर से जुड़ा है, जहाँ उनका बलिदान हुआ था।। यह घटनाक्रम हमें बताता है कि समय और सीमाओं के पार भी कर्म-चक्र की अटूट कड़ी कैसे जुड़ती है।
बात सालों पहले की है, 1961 में जब लाहौर शहर का कायाकल्प हो रहा था। शहर के बीचों-बीच खड़ी एक पुरानी जेल को गिराने का फैसला हुआ। वह कोई मामूली जेल नहीं थी। यह वही जेल थी, जहां 23 मार्च 1931 को भारत के महान क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी। सरकार ने उस जेल को गिराकर वहां एक खूबसूरत कॉलोनी बसाने की योजना बनाई और नाम रखा शादमान (खुशनुमा) कॉलोनी। वहां जहां कभी फांसी का फंदा लगा था, वहां एक चौराहा बना दिया गया जिसे ‘शादमान चौक’ कहा जाने लगा।
उसी शादमान चौक पर 11 नवंबर 1974 को एक कार पर हमला हुआ। गोलियां चलीं, एक बुजुर्ग की मौत हुई और उनका शव उसी चौराहे पर गिरा। मरने वाले थे मोहम्मद अहमद कसूरी। उस हत्या का इल्जाम लगा पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो पर। मृतक के बेटे अहमद रजा कसूरी ने संसद में 20 नवंबर 1974 को खून से सनी कमीज लहराकर भुट्टो पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने एफआईआर दर्ज कराई, लेकिन प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई केस चले कैसे? इसलिए वह मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
1973 के दौर में जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के सबसे ताकतवर नेता बनके उभरे थे। वह पहले ऐसे निर्वाचित प्रधानमंत्री थे जिन पर सेना का कोई दबाव नहीं था, बल्कि वह खुद सेना के मालिक थे। अपनी ताकत बनाए रखने के लिए उन्होंने सेना प्रमुख के पद पर जून, 1976 में एक ऐसे अफसर को बैठाया जो वरिष्ठता में सातवें नंबर पर था लेकिन वफादारी में पहले। उनका नाम था जिया-उल-हक। मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। महज 13 महीने बाद 5 जुलाई 1977 को यही वफादार जिया-उल-हक भुट्टो के गले की फांस बन गया। उसने सैन्य तख्तापलट कर भुट्टो को गिरफ्तार कर लिया और देश में मार्शल लॉ लगा दिया।
भुट्टो की लोकप्रियता इतनी जबरदस्त थी कि जब तक वह जिंदा थे, जिया की कुर्सी खतरे में थी। इसलिए भुट्टो को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए उसे एक बहाने की तलाश थी । वह बहाना मिला वही पुरानी एफआईआर, जिसमें भुट्टो पर कसूरी के पिता की हत्या का आरोप था। किसी को नहीं पता कि उस आरोप में कितनी सच्चाई थी, मगर जांच को तेजी से आगे बढ़ाया गया और अदालत ने पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री को मौत की सजा सुना दी।
फिर वह घड़ी आई, 4 अप्रैल 1979 की सुबह 2 बजकर 5 मिनट। ठीक उसी वक्त जब जेलर ने इशारा किया, जल्लाद ने लीवर खींच दिया और जुल्फिकार अली भुट्टो का शव पांच फुट ऊपर झूलने लगा। करीब आधे घंटे बाद उन्हें नीचे उतारा गया और डॉक्टर ने नाड़ी देखकर मृत घोषित कर दिया। जब भुट्टो को फांसी दी गई, उस वक्त शायद ही किसी ने सोचा होगा कि इतिहास का पहिया कितना अजीब घूम चुका है।
सबसे बड़ा तमाशा यह है कि जिस शख्स की हत्या इस केस की जड़ बनी, वह मोहम्मद अहमद कसूरी कभी ब्रिटिश हुकूमत में अफसर था। और उसी कसूरी ने सालों पहले भगत सिंह की फांसी के वारंट पर दस्तखत किए थे। यानी जिस जमीन पर भगत सिंह को फांसी दी गई, वहां का चौराहा बना शादमान चौक, वहीं पर उस शख्स की हत्या हुई जिसने भगत सिंह के डेथ वारंट पर हस्ताक्षर किए थे।
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