बिलासपुर। हाई कोर्ट ने बालोद जिले के बहुचर्चित सामूहिक दुष्कर्म और हत्या मामले के तीन आरोपियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्य के रूप में डीएनए रिपोर्ट दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय है, बशर्ते अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य उसका समर्थन करें।
बालोद जिले के डौंडीलोहारा थाना क्षेत्र में 12 जून 2021 की सुबह एक महिला की घर के अंदर संदिग्ध हालत में लाश मिली थी। महिला के परिजनों ने बताया कि घर का दरवाजा अंदर से बंद था। पीछे के रास्ते से बच्ची को अंदर भेजकर कुंडी खुलवाई गई। अंदर महिला का शव बिस्तर पर पड़ा था, उसके हाथ तौलिये से पीछे बंधे थे और चेहरे पर चोट के गहरे निशान थे। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में दम घुटने से हत्या की पुष्टि हुई। जांच में सामने आया कि हत्या से पहले महिला के साथ दुष्कर्म हुआ था। पुलिस जांच के दौरान पता चला कि आरोपी कमलनारायण साहू मृतका के साथ पिछले 10-12 वर्षों से संबंध था। ग्रामीणों ने घटना की रात अन्य दो आरोपियों कमलेश कुमार और उत्तम कुमार को मृतका के घर के पास संदिग्ध हालत में घूमते देखा था। इस मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं था। पुलिस ने फोरेंसिक जांच और डीएनए टेस्ट करवाया। फॉरेंसिक जांच और डीएनए टेस्ट ने पता चला कि हत्या से पहले महिला के साथ जबरन दुष्कर्म किया गया था। पुलिस ने कमल नारायण साहू, कमलेश कुमार और उत्तम कुमार को गिरफ्तार किया था। तीनों के खिलाफ आईपीसी की धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने तीनों को सामूहिक बलात्कार और हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा दी थी। इसके खिलाफ तीनों ने हाई कोर्ट में अपील की थी। हाई कोर्ट ने तीनों की अपील खारिज कर दी है।
जांच के दौरान मृतका के कपड़ों, तकिए और जैविक नमूनों की फॉरेंसिक जांच कराई गई। हाई कोर्ट ने माना कि जांच एसओपी अनुसार हुई और साक्ष्य से छेड़छाड़ का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। हाई कोर्ट ने 39 पन्नों फैसले में कहा कि डीएनए तकनीक एक शक्तिशाली वैज्ञानिक उपकरण है। यदि नमूने सही तरीके से एकत्र और संरक्षित किए गए हैं तो केवल चश्मदीद गवाह न होने से आरोपी बच नहीं सकते।
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