‘’हिंसा ने तब और अब की पुलिस के बीच अंतर को भी साफ कर दिया ,एक दौर था जब पुलिस के हाथों में लंबा चौड़ा डंडा हुआ करता था। पुलिस अफसर पिस्टल और पुलिसकर्मी राइफल लेकर चलते थे। यह दोनों नजर नहीं आया। पुलिस की वर्दी, पुलिस का डंडा और कानून का खौफ ग्रामीणों के मन से क्यों गया और किसके लिए गुस्से में थे ग्रामीण। यह सवाल अब भी उठ रहा है’’
रायगढ़। जिंदल को कोल ब्लाक आवंटन का विरोध कर रहे प्रभावित ग्रामीणों के गुस्सा और दिक्कतों को रायगढ़ पुलिस या तो समझ नहीं पाई या फिर जानबुझकर उसे नजरअंदाज करते रहे। तमनार में जो कुछ घटा,उसके लिए पुलिस जितनी जिम्मेदार है उतना ही जिला प्रशासन भी। पुलिस की प्रभावी भूमिका और एसपी के दिल्ली कनेक्शन के चलते जिला प्रशासन हस्तक्षेप नहीं कर पाया। तमनार में महिला पुलिस अधिकारी के साथ जो कुछ घटा, इंटेलिजेंस तो फेल साबित हुआ ही, आला पुलिस अफसरों की बेपरवाही को भी उतना ही जिम्मेदार माना जा रहा है।

कोल ब्लाक आवंटन के लिए जनसुनवाई का विरोध करने वाले 14 प्रभावित गांव के ग्रामीण बीते पखवाड़ेभर से तमनार में आंदोलन कर रहे थे। घर द्वार छोड़कर कड़ाके की ठंड में धरना स्थल पर बैठे एक ही मांग कर रहे थे, जनसुनवाई को स्थगित किया जाए। जिला व पुलिस प्रशासन की बेपरवाही और कड़ाके की ठंड में धरना पर बैठे ग्रामीणों की सुध ना लेने के कारण ग्रामीणों का गुस्सा दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था। जिंदल ग्रुप का काम बेरोकटोक जारी था। धरना स्थल पर बैठे प्रभावित ग्रामीण अपनी आंखों के सामने भारी वाहनों की आवाजाही देख रहे थे, कल्पना भी कुछ ऐसे ही कर रहे थे कि आने वाले दिनों में उनका गांव भी कोल ब्लाक की भेंट चढ़ जाएगा और वे सब बेघरबार हो जाएंगे। चिंता धीरे-धीरे गुस्से का रूप लेते गया और घटना के दिन यही गुस्सा ज्वाला बनकर फूट पड़ा। ग्रामीणों के गुस्से का शिकार महिला पुलिस अधिकारी को बनना पड़ा। शर्मनाक बात ये कि महिला पुलिस अफसर को लात से मारा गया, वर्दी फाड़ दी और तकरीबन अर्धनग्न कर दिया गया। पुलिस के लिए इससे बड़ी शर्मनाक बात और क्या होगी। भारी भरकम अमला होने के बाद महिला अफसर को अपमानित और शर्मसार होने के लिए भीड़ के हवाले कर दिया। वो तो अच्छा हुआ कोई और बड़ी घटना नहीं घटी। भीड़ का क्या। महिला अफसर की जान पर ही बन आती तब क्या होता। हिंसक भीड़ के आगे पुलिस को जैसा असहाय तमनार में देखा गया,इसके पहले यह कहीं और नहीं हुआ। हिंसक भीड़ के आगे पुलिस के अधिकारी व जवान एक महिला अफसर को भीड़ के बीच छोड़कर भाग खड़े हुए। सीसीटीवी में यह सब कैद हो गया है। अब तो ना पुलिस के अफसर और ना ही जवान इस बात से मुकर सकते कि उसने महिला अफसर को भीड़ के बीच छोड़कर अपनी जान बचाकर नहीं भागे।

तमनार हिंसा ने तब और अब की पुलिस के बीच अंतर को भी साफ कर दिया है। एक दौर था जब पुलिस के हाथों में लंबा चौड़ा डंडा हुआ करता था। पुलिस अफसर राइफल लेकर चलते थे। यह दोनों नजर नहीं आया। पुलिस की वर्दी, पुलिस का डंडा और कानून का खौफ ग्रामीणों के मन से क्यों गया और किसके लिए गुस्से में थे ग्रामीण। यह सवाल अब भी उठ रहा है। पुलिस का इंटेलिजेंस इस मामले में पूरी तरह फेल साबित हो गया और ग्रामीणों के आंदोलन के हिंसक रूप लेने की भनक तक नहीं लगा।

महिला पुलिस अफसर के साथ बदसुलूकी करने वाले आरोपी को पकड़कर पुलिस ने जूत की माला पहनाई और जुलूस भी निकाला। यह सब महिला पुलिस कर्मियों का मनोबल बढ़ाने के लिए शायद किया गया होगा। सवाल अब भी वही है, हिंसक भीड़ के बीच महिला पुलिस अधिकारी को छोड़कर अधिकारी व जवान क्यों भागे। भीड़ के बीच से महिला अफसर को सुरक्षित क्यों नहीं निकाल पाए। भीड़ के आगे पुलिस असहाय क्यों नजर आई।

एक सवाल यह भी उठ रहा है, तमनार की घटना को लेकर रायगढ़ पुलिस प्रशासन की जितनी फजीहत प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर होनी थी हो चुकी है। हिंसक भीड़ के बीच महिला पुलिस अधिकारी को छोड़कर भागने वाले अफसरों के खिलाफ जब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। कार्रवाई तो दूर जिम्मेदारी तक तय नहीं हो पाई है। आला अफसर पर सरकार हाथ डालने से इसलिए बचते नजर आ रही है, दिल्ली कनेक्शन और एक दिग्गज भाजपा नेता की सिफारिश पर वे जिले में शिफ्ट हुए हैं।
प्रधान संपादक


