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August 30, 2026 5:48 pm

जेन-जी शब्द पर रघु ठाकुर की आपत्ति, बोले- विदेशी प्रभाव से तय हो रहे आंदोलनों के एजेंडे

जन आंदोलनों की दशा-दिशा पर लोसपा के राष्ट्रीय संरक्षक ने रखे विचार

CBN36 बिलासपुर। लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी (लोसपा) के संस्थापक एवं राष्ट्रीय संरक्षक और समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने ‘जेन-जी’ जैसे विदेशी शब्दों के बढ़ते चलन पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि आज जन आंदोलनों और सामाजिक विमर्श में विदेशी प्रभाव, फंडिंग और नैरेटिव हावी होते जा रहे हैं। बिलासपुर प्रेस क्लब में ‘जन आंदोलन : दशा और दिशा’ विषय पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए ठाकुर ने कहा कि मौजूदा दौर के कई आंदोलन स्वत:स्फूर्त होने के बजाय प्रायोजित नजर आते हैं। उनके लक्ष्य सीमित होने के कारण व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव नहीं पड़ता।

ठाकुर ने कहा कि आंदोलनों में नई पीढ़ी की भागीदारी बढ़ी है और हालिया आंदोलनों से सरकारें कुछ हद तक झेंपी भी हैं, लेकिन आंदोलन की दिशा और उद्देश्य स्पष्ट होना जरूरी है। दिल्ली के आंदोलन का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री को गाली देने, तोड़फोड़ और खराब भाषा के इस्तेमाल पर असहमति जताई। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक आंदोलन में हिंसा और अभद्र भाषा की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

पूंजीवाद और विदेशी ताकतों के प्रभाव का आरोप

ठाकुर ने कहा कि दुनिया के विभिन्न देशों में आज जो एजेंडे तय किए जा रहे हैं, उनके पीछे विदेशी ताकतों का प्रभाव दिखाई देता है। फ्रांसिस फुकुयामा की पुस्तक ‘द एंड ऑफ हिस्ट्री’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि समानता, समाजवाद और बराबरी के विचारों को कमजोर कर पूंजीवाद और आर्थिक असमानता को प्रमुख व्यवस्था के रूप में स्थापित किया गया। उनका आरोप है कि सामाजिक और आर्थिक विषमता के वास्तविक सवालों से ध्यान हटाकर लोगों को मजहबी और सांस्कृतिक विवादों में उलझाया जा रहा है।

जन आंदोलन के बताए पांच मूल तत्व

रघु ठाकुर ने किसी भी सच्चे जन आंदोलन के पांच बुनियादी तत्व बताए। उन्होंने कहा कि आंदोलन स्वत:स्फूर्त होना चाहिए और विदेशी फंडिंग या कॉर्पोरेट संसाधनों के बजाय जनता के सहयोग से चलना चाहिए। इसका लक्ष्य केवल तात्कालिक लाभ हासिल करना नहीं, बल्कि व्यवस्था में व्यापक बदलाव होना चाहिए। आंदोलन में गाली-गलौज, पथराव और तोड़फोड़ जैसी हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। साथ ही आंदोलन की भाषा तार्किक, संयमित और लोकतांत्रिक होनी चाहिए।

अन्ना आंदोलन और नीट मामले पर उठाए सवाल

ठाकुर ने 2010-11 के अन्ना आंदोलन को प्रायोजित बताते हुए कहा कि इससे सरकारें बदलीं, लेकिन व्यवस्था में अपेक्षित बदलाव नहीं आया। नीट पेपर लीक मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कोटा में छात्रों की आत्महत्या जैसी गंभीर घटनाओं के समय बड़े नेता विदेश दौरों पर थे। उन्होंने सवाल उठाया कि महीनों बाद सड़क पर उतरना वास्तविक जनहित है या प्रायोजित राजनीति का हिस्सा।

महाराष्ट्र के भाषा विवाद पर केंद्र को घेरा

महाराष्ट्र में गैर-मराठी और हिंदी भाषियों के साथ कथित दुर्व्यवहार को ठाकुर ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत हिंदी को लेकर महाराष्ट्र में उठे विरोध के बाद सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। ठाकुर ने आरोप लगाया कि तमिलनाडु में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विरोध के बाद केंद्र ने समग्र शिक्षा का करीब 2,000 करोड़ रुपये का अनुदान रोक दिया, जबकि महाराष्ट्र के मामले में केंद्र का रुख अलग रहा।

उन्होंने पुणे में हिंदी बोलने को लेकर कथित रूप से प्रताड़ित किए जाने के बाद एक छात्र की आत्महत्या का भी उल्लेख किया और इसे ‘नया भाषाई साम्राज्यवाद’ करार दिया।

प्रेस वार्ता में वरिष्ठ साहित्यकार रामकुमार तिवारी, जावेद उस्मानी सहित लोसपा के पदाधिकारी और ठाकुर के समर्थक मौजूद रहे।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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