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August 30, 2026 4:39 pm

किशोर न्याय व्यवस्था को दंडात्मक नहीं, पुनर्वासात्मक और संवेदनशील बनाने पर जोर: मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने कहा-बच्चों के सर्वोत्तम हित को बनाया जाए मूल आधार

CBN36 बिलासपुर, 30 अगस्त 2026। किशोर न्याय  बालकों की देखरेख और संरक्षण अधिनियम, 2015 के एक दशक के क्रियान्वयन एवं आगे की राह पर राज्य स्तरीय हितधारकों के परामर्श की ग्यारहवीं कड़ी का आयोजन छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी के विवेकानंद सभागार में किया गया। कार्यक्रम का आयोजन छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की पॉक्सो समिति एवं किशोर न्याय समिति द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य न्यायिक अकादमी तथा छत्तीसगढ़ राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, बिलासपुर के सहयोग से किया गया।

कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने किया। उन्होंने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम के एक दशक के क्रियान्वयन से इसकी उपलब्धियों का आकलन करने के साथ शेष चुनौतियों और भविष्य की कार्ययोजना पर विचार करने का अवसर मिला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किशोर न्याय व्यवस्था की सफलता केवल मामलों के निराकरण अथवा आदेश पारित करने से नहीं, बल्कि इस बात से तय होनी चाहिए कि न्याय प्रणाली के संपर्क में आने वाले प्रत्येक बच्चे के साथ गरिमा, करुणा, निष्पक्षता और संवेदनशीलता से व्यवहार हो तथा उसे जीवन को दोबारा संवारने का सार्थक अवसर मिले।

मुख्य न्यायाधीश ने “बालक के सर्वोत्तम हित” को किशोर न्याय व्यवस्था का मूल मार्गदर्शक सिद्धांत बताते हुए कहा कि कानून के उल्लंघन के आरोपी बालक अथवा देखरेख एवं संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे को केवल उसकी परिस्थितियों और कमजोरियों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। न्याय व्यवस्था का दृष्टिकोण दंडात्मक के बजाय पुनर्स्थापनात्मक, बहिष्करण के बजाय पुनर्वासात्मक और संवेदनशील होना चाहिए। उन्होंने बच्चों की समस्याओं की शीघ्र पहचान और समयबद्ध हस्तक्षेप की आवश्यकता पर भी बल दिया।

उन्होंने न्यायपालिका, पुलिस, किशोर न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समिति, जिला बाल संरक्षण इकाई और अन्य हितधारकों के बीच प्रभावी समन्वय को आवश्यक बताते हुए कहा कि बच्चों से जुड़े इस दायित्व का निर्वहन कोई एक संस्था अकेले नहीं कर सकती। न्यायिक अधिकारियों को बाल मनोविज्ञान, आघात तथा बच्चों की विकासात्मक आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता पर भी उन्होंने जोर दिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा, “आज हम अपने बच्चों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार करते हैं, वही यह निर्धारित करेगा कि हम कल किस प्रकार का समाज विकसित करेंगे।”

कार्यक्रम में दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी ने की, जबकि न्यायमूर्ति राकेश मोहन पाण्डेय, न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल और न्यायमूर्ति बिभुदत्त गुरु ने सह-अध्यक्षता की। कार्यक्रम में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तिगण, रजिस्ट्री एवं न्यायिक अकादमी के अधिकारी, विधिक सेवा प्राधिकरण के पदाधिकारी, किशोर न्याय बोर्ड, बाल कल्याण समितियों, पुलिस, महिला एवं बाल विकास विभाग, शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण विभाग सहित विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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