CBN36 बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 के तहत तीसरे पक्ष की निजी जानकारी साझा करने के संबंध में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के विवाह पंजीयन आवेदन, जन्मतिथि, पहचान पत्र, फोटो और अन्य निजी दस्तावेज आरटीआई के माध्यम से किसी तीसरे पक्ष को उपलब्ध नहीं कराए जा सकते, जब तक कि उससे जुड़ा कोई व्यापक जनहित सिद्ध न हो।
मामले में अंबिकापुर निवासी डीके सोनी ने सूरजपुर जिले के अपर कलेक्टर एवं विशेष विवाह अधिकारी के समक्ष कपिल देव पैकरा और लवकेश कुमार पैकरा के विवाह पंजीयन आवेदन, संलग्न दस्तावेज, आदेश और इश्तहार की प्रमाणित प्रतियां आरटीआई के तहत मांगी थीं। जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी ने यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया कि आवेदक तीसरे पक्ष का व्यक्ति है और मांगी गई जानकारी निजी प्रकृति की है।
इसके बाद डीके सोनी ने राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की, जिसे आयोग ने 10 अक्टूबर 2019 को खारिज कर दिया। आयोग के आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, लेकिन अधिनियम की धारा 8(1)(जे) व्यक्तिगत निजता की भी सुरक्षा करती है। विवाह पंजीयन से जुड़े दस्तावेजों में नाम, पता, जन्मतिथि, फोटो और पहचान पत्र जैसी संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी होती है। यदि आवेदक यह साबित नहीं कर पाता कि जानकारी का खुलासा किसी बड़े जनहित, भ्रष्टाचार के खुलासे या पद के दुरुपयोग से जुड़ा है, तो ऐसी जानकारी देना व्यक्ति की निजता का उल्लंघन होगा।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि निजी दस्तावेजों को केवल आरटीआई के आधार पर तीसरे पक्ष को उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।
हालांकि, न्यायालय ने अपने आदेश में राज्य सूचना आयोग की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आयोग राज्य की अंतिम अपीलीय संस्था है और उसका दायित्व केवल प्रक्रियात्मक कमियों पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि यह तय करना है कि मांगी गई सूचना कानून के तहत दी जा सकती है या धारा 8 के तहत उससे छूट प्राप्त है। इस संबंध में कोर्ट ने आयोग के आदेश को निरस्त करते हुए मामला पुनः राज्य सूचना आयोग को भेज दिया और निर्देश दिया कि दोनों पक्षों को सुनकर 90 दिनों के भीतर विधि अनुसार नया आदेश पारित किया जाए।
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