बारिश,बाढ़ और सियासत
बिलासपुर में जमकर बारिश हुई, दो दशक पहले कमोबेश ऐसी ही बारिश हुई थी। तभी भी शहर का अधिकांश मोहल्ला व सड़कें डूब गई थी,अभी भी कमोबेश कुछ वैसा ही नजारा था। ना तो जिला प्रशासन ने तब सबक लिया और ना ही आज, सिस्टम कुछ ऐसा है, पटरी पर चलते-चलते अचानक बेपटरी हो चला है। शहरवासियों से लेकर गांव के लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। लोगों की रातों की नींदे हराम हो गई। सामान खराब हुआ सो अलग। पर इन सबसे से सियासत करने वालों को क्या वास्ता। उनको तो बस अपनी नेतागीरी चमकाने की पड़ी है। कोई कमर भर पानी में खड़ा है तो कोई किसी का हाथ थामे पानी में चल रहा है। यह जनसेवा नहीं, और ना ही आप समझिए, ये आपकी चिंता में गए थे। इनको तो बस अपनी राजनीतिक रोटी सेंकनी थी और अपनी राजनीति चमकानी थी। सो रोटी भी सेंक लिया और अपनी सियासत भी चमका ली। अब ना तो आपकी चिंता और ना ही आप पर क्या गुजर रही है इसे देखने की।
वाह रे सियासत, मौका मिला नहीं कि बस शुरू हो गए
राजनीति भी क्या रंग दिखाती है। नाम ही कुछ ऐसा है। सियासत करने वालों को कहें या फिर इसमें रंगने वाले नेताओं की बात करें। मौका मिला नहीं कि हो गए शुरू। कुछ ऐसा ही वाकया ठीक एक दिन पहले प्रेस क्लब में देखने को मिली। लोग बारिश से बेहाल होते रहे और यहां कुछ लोग अपनी राजनीति चमकाते दिखाई दिए। सियासत करने वालों काे लोगों के बजाय अपनी चिंता ज्यादा दिखाई दी। तभी तो जल भराव वाले इलाकों में जाना छोड़, राजनीति चमकाने आ गए। आरोपों का दौर चला। जी भरकर कोसे और हाय हैलो करते चलते बने। जरा सोचिए। इसमें भला फायदा किसका हुआ। उनका तो बिलकुल भी नहीं, जो बारिश के बाद तीन दिनों तक हैरान और परेशान नजर आए। फिर एक सवाल यह भी,आखिर किन मुद्दों को लेकर बात की और भला किसका हुआ।
वार और पलटवार का खेल
सियासत पर बात चल ही पड़ी है तो इसे थोड़ा आगे और बढ़ा लेते हैं। भैया के बंगले पर मीटिंग का दौर चला। मोहल्ला समिति से लेकर वार्डों में कामकाज देखने वालों के बीच भैया घंटों बिताए। उनका और मोहल्ले वालों का हालचाल जाना। कामकाज को लेकर चर्चा की। जैसा कि उनका अपना अंदाज है, उसी अंदाज में उन्होंने एक-एक पदाधिकारियों से बात की, उनकास हाल जाना और साथ ही साथ मोहल्ले की भी। वर्षों से राजनीति कर रहे हैं सो शहर के चप्पे-चप्पे से अच्छी तरह वाकिफ हैं और उसी अंदाज में वे अपना काम करते रहते हैं। कहने वाले लाख कहें, जो काम का अंदाज है,उस पर राई भर फर्क नहीं पड़ना है। वार और पलटवार का खेल शहरवासी देख रहे हैं। पलटवार का अंदाज कुछ ज्यादा ही भा गया।
यहां नजर नहीं आ रहा काकरोच
दिल्ली के जंतर मंतर में जो कुछ घट रहा है, देश और दुनिया की नजरें लगी हुई है। इस दौर में एक नया नाम उभरकर सामने आया। सीजेपी, काकरोच जनता पार्टी। अब तो लोगों की जुबान पर यह पार्टी घर कर गई है। जंतर-मंतर में तो काकरोच ही काकरोच नजर आ रहा है। काकरोच से दिल्ली हिलने लगी है। काकरोच ने स्टूडेंट्स के मुद्दे पर सरकार को हिलाने का माद्दा जो रखने लगा है। शहर में काकरोच नजर नहीं आ रहा है। कहने वालों की बातों पर भरोसा करें तो थोड़ा ठहरिए, जंतर-मंतर की तर्ज पर यहां भी काकरोच नजर आने लगेंगे। तब क्या होगा। यह तो सियासत करने वाले जाने।
अटकलबाजी
बारिश के दौरान कमर भर पानी में खड़े होकर फोटो सेशन कराने वाले कांग्रेस नेताओं का क्या हाल है। आपने हालचाल जाना या नहीं। जरा पता करिए, कितने लोग स्कीन स्पेशलिस्ट के पास होकर आ गए हैं।
जंतर-मंतर की सियासत से परे, शहर में आस्था यात्रा निकलने वाली है। आस्था यात्रा के पीछे वाकई आस्था है या फिर राजनीतक स्वार्थ।
प्रधान संपादक



