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October 10, 2026 6:41 pm

हिंदी विश्वविद्यालय में साहित्यिक विमर्श के साथ विधि विद्यार्थियों ने परखी न्यायिक दक्षता, मूट कोर्ट प्रतियोगिता आयोजित

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साहित्य ने आत्महीनता की ग्रंथि से निकालने का काम किया : प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त

साहित्य की स्वतंत्र सत्ता पर विशेष व्याख्यान, विधि विद्यार्थियों ने मूट कोर्ट में किया तर्क-कौशल का प्रदर्शन

CBN36 वर्धा। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में साहित्यिक चिंतन और विधि शिक्षा से जुड़ी गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों की बौद्धिक एवं व्यावहारिक क्षमताओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसी क्रम में कालजयी आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जयंती के अवसर पर हिंदी साहित्य विभाग की ओर से ‘साहित्य के स्वरूप की स्वतंत्र सत्ता और आचार्य रामचंद्र शुक्ल’ विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। वहीं, विधि विभाग के विद्यार्थियों के लिए मूट कोर्ट प्रतियोगिता का आयोजन कर उनकी कानूनी समझ, तर्कशक्ति और न्यायालयीन कार्यप्रणाली से परिचित होने के अवसर प्रदान किए गए।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर आयोजित व्याख्यान में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष तथा दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अवकाशप्राप्त अध्यक्ष प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साहित्य ने लोगों को आत्महीनता की ग्रंथि से निकालने का काम किया। उन्होंने कहा कि विश्वबोध का रास्ता देशबोध से होकर निकलता है। हमें भारत के स्वत्व की रक्षा करनी चाहिए।

विश्वविद्यालय के महादेवी वर्मा सभागार में सोमवार, 5 अक्टूबर को आयोजित व्याख्यान में हिंदी साहित्य विभाग की अध्यक्ष प्रो. प्रीति सागर ने स्वागत एवं प्रस्तावना प्रस्तुत की। प्रो. गुप्त ने आचार्य शुक्ल की समग्र साहित्य-दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे रचना के साथ-साथ आलोचना के क्षेत्र में भी साहित्य की स्वतंत्र सत्ता के पक्षधर थे। वे उन आलोचकों में अग्रणी थे, जिन्होंने विदेशी आलोचकों के विचारों से संवाद स्थापित किया। उन्होंने साहित्य में लोकमंगल की साधनावस्था को विशेष महत्व दिया तथा आलोचना के क्षेत्र में योगदान के साथ पत्र-पत्रिकाओं के लिए शब्दावली विकसित की। प्रो. गुप्त ने आचार्य शुक्ल के रचना-संसार के माध्यम से कर्मवाद, भारतीय आदर्श, वैचारिक एवं सांस्कृतिक गुलामी और कल्पना की भूमिका जैसे विषयों को भी व्याख्यायित किया। उन्होंने बताया कि आचार्य शुक्ल कल्पना को साध्य नहीं, बल्कि साधन मानते थे। इस अवसर पर प्रो. गुप्त का स्वागत प्रो. प्रीति सागर ने सूतमाला और विश्वविद्यालय का प्रतीक चिह्न भेंट कर किया। कार्यक्रम का संचालन हिंदी साहित्य विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रूपेश कुमार सिंह ने किया तथा आभार सहायक प्रोफेसर डॉ. सुनील कुमार ने व्यक्त किया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और आचार्य रामचंद्र शुक्ल के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इस दौरान कालिंदी गुप्त, प्रो. श्यामसुंदर पांडेय, डॉ. रामानुज अस्थाना, डॉ. अमरेन्द्र कुमार शर्मा, डॉ. शैलेश मरजी कदम, डॉ. कोमल कुमार परदेशी सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

इसी क्रम में विश्वविद्यालय के विधि विभाग ने 8 अक्टूबर को विद्यार्थियों के लिए मूट कोर्ट प्रतियोगिता का आयोजन किया। विधि विभाग के अधिष्ठाता प्रो. जनार्दन कुमार तिवारी के मार्गदर्शन में आयोजित प्रतियोगिता का उद्घाटन उन्होंने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मूट कोर्ट विद्यार्थियों के व्यावहारिक कानूनी ज्ञान, तार्किक क्षमता और न्यायालयीन प्रक्रिया की समझ विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रतियोगिता के प्रथम चरण में सात टीमों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतिभागियों ने विभिन्न कानूनी विषयों पर अपनी तर्क-वितर्क क्षमता और न्यायशास्त्र की समझ का प्रदर्शन किया। वरिष्ठ अधिवक्ता रविंद्र एम. गुरु और रुचि चांडक सहित विभाग के शिक्षक उपस्थित रहे। उन्होंने विद्यार्थियों की दलीलों और प्रकरणों की प्रस्तुति का सूक्ष्मता से मूल्यांकन किया तथा उन्हें न्यायालय की कार्यप्रणाली और व्यावहारिक वकालत के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया।

प्रतियोगिता के सफल आयोजन में विधि विद्यापीठ के अधिष्ठाता प्रो. जनार्दन कुमार तिवारी तथा विधि विभाग के शिक्षक प्रभारी डॉ. परमानंद राठौड़, डॉ. वैभव सिंह यादव, डॉ. नितेश कुमार सिंह, डॉ. ज्योति सोनी, सुचिता नारायण नागपुरे और श्रुति नाथ का विशेष योगदान रहा। प्रतियोगिता का अगला और अंतिम चरण 9 अक्टूबर को विधि विभाग के मूट कोर्ट हॉल में आयोजित किया जाना निर्धारित था।

विश्वविद्यालय में आयोजित इन दोनों गतिविधियों ने साहित्यिक चिंतन, आलोचनात्मक दृष्टि, तार्किक क्षमता और व्यावहारिक ज्ञान के महत्व को रेखांकित किया। जहां आचार्य रामचंद्र शुक्ल के विचारों के माध्यम से भारतीय साहित्य-दृष्टि और सांस्कृतिक स्वत्व पर विमर्श हुआ, वहीं मूट कोर्ट प्रतियोगिता ने विधि विद्यार्थियों को न्यायिक प्रक्रिया का व्यावहारिक अनुभव प्रदान किया।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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