भारतीय नारी की सदियों लंबी यात्रा: कभी ऋषिका, कभी योद्धा, कभी शासिका और अब लोकतंत्र की निर्णायक सहभागी
वर्धा । भारतीय नारी की कहानी केवल संघर्ष की कहानी नहीं है। यह उस निरंतर परिवर्तन की कहानी है, जिसमें एक महिला कभी वेदों की ऋचा रचती दिखाई देती है, कभी सत्ता के सिंहासन पर बैठती है, कभी रणभूमि में तलवार उठाती है, कभी समाज सुधार की मशाल थामती है और आज लोकतंत्र के सर्वोच्च मंच संसद में बैठकर देश के कानून बनाने में भागीदारी निभा रही है।
वैदिक काल से संसद भवन तक का यह सफर हजारों वर्षों का है। इस यात्रा में उतार-चढ़ाव भी आए, अधिकार सीमित हुए, सामाजिक बंधन बढ़े, लेकिन हर दौर में महिलाओं ने अपनी जगह बनाने का रास्ता तलाशा। इसलिए भारतीय नारी का इतिहास न तो लगातार स्वतंत्रता की कहानी है और न लगातार पराधीनता की—यह बदलते समय के साथ अपनी भूमिका और अधिकारों को पुनर्परिभाषित करने की कहानी है।
जब ज्ञान के केंद्र में थीं ऋषिकाएं
भारतीय परंपरा में महिलाओं की बौद्धिक उपस्थिति के उदाहरण प्राचीन काल से मिलते हैं। लोपामुद्रा, घोषा, अपाला और वाक् अम्भृणी जैसी ऋषिकाओं का उल्लेख वैदिक साहित्य में मिलता है। ऋग्वेद में उनसे जुड़े सूक्त स्त्री की बौद्धिक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।
उपनिषदों में गार्गी और मैत्रेयी के उदाहरण और भी उल्लेखनीय हैं। बृहदारण्यक उपनिषद में गार्गी का याज्ञवल्क्य से दार्शनिक संवाद बताता है कि ज्ञान और दर्शन के गंभीर प्रश्नों पर महिलाएं भी विमर्श का हिस्सा थीं। मैत्रेयी की आत्मज्ञान को लेकर जिज्ञासा भारतीय चिंतन परंपरा में महिला की बौद्धिक भूमिका को सामने लाती है।
हालांकि इतिहास को संतुलित दृष्टि से देखना जरूरी है। कुछ विदुषी महिलाओं की उपस्थिति को पूरे समाज की महिलाओं की समान स्थिति का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
बदलती सामाजिक व्यवस्था और बढ़ती सीमाएं
समय के साथ सामाजिक संरचनाएं बदलीं। परिवार, वंश, संपत्ति और धार्मिक कर्मकांडों की बदलती व्यवस्था के साथ महिलाओं की भूमिका अधिक परिवार-केंद्रित होती गई। बाद की धर्मशास्त्रीय परंपराओं में स्त्री की स्वतंत्रता पर कई सीमाएं दिखाई देती हैं।
मनुस्मृति का कथन “न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति” उस सामाजिक सोच का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें महिला के जीवन को पिता, पति और पुत्र की संरक्षकता से जोड़ा गया।
यहीं से भारतीय नारी की यात्रा का एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है-एक ओर प्राचीन साहित्य में ज्ञान और प्रश्न करने वाली महिलाएं दिखाई देती हैं, तो दूसरी ओर बाद के दौर में उनकी स्वतंत्रता पर सामाजिक सीमाएं भी दिखाई देती हैं।
मध्यकाल में सिंहासन से रणभूमि तक
मध्यकाल को केवल महिलाओं के पिछड़ने का दौर मानना भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। इस काल में रज़िया सुल्तान ने दिल्ली की सत्ता संभाली। रानी दुर्गावती ने गोंडवाना की रक्षा के लिए युद्ध किया। नूरजहाँ ने मुगल दरबार की राजनीति और प्रशासन पर प्रभाव डाला। रुद्रमादेवी और अहिल्याबाई होल्कर ने शासन और लोककल्याण के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।
इसी काल में भक्ति आंदोलन ने महिलाओं को आत्म-अभिव्यक्ति का एक नया रास्ता दिया। मीराबाई ने सामाजिक अपेक्षाओं और राजपरिवार की सीमाओं से आगे बढ़कर भक्ति को अपनी पहचान बनाया।
यानी भारतीय इतिहास में नारी एक ही रूप में नहीं रही -कहीं वह शासिका थी, कहीं योद्धा, कहीं कवयित्री और कहीं आध्यात्मिक चेतना की आवाज।
शिक्षा ने खोला बदलाव का दरवाजा
19वीं शताब्दी में भारतीय समाज में सुधार की नई लहर उठी। सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा जीवन और महिला शिक्षा जैसे प्रश्न सार्वजनिक बहस का हिस्सा बने।
राजा राममोहन राय के प्रयासों से सती प्रथा के खिलाफ आंदोलन को बल मिला और 1829 में इस पर कानूनी रोक लगी। ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम आया।
सावित्रीबाई फुले ने 1848 से लड़कियों की शिक्षा के लिए ऐतिहासिक कार्य शुरू किया। पंडिता रमाबाई ने भी महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक सुधार के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।शिक्षा ने भारतीय नारी को केवल पढ़ना नहीं सिखाया, बल्कि सवाल करना भी सिखाया।
स्वतंत्रता संग्राम में बदली पहचान
1857 के विद्रोह ने महिला शक्ति का एक अलग रूप सामने रखा। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बनीं। अवध की बेगम हजरत महल ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध नेतृत्व किया।
बाद में सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, उषा मेहता समेत अनेक महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। हजारों सामान्य महिलाओं ने सत्याग्रह, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार, जेल यात्राओं और जन आंदोलनों में भाग लिया।अब नारी की भूमिका घर की चारदीवारी से निकलकर राष्ट्र निर्माण तक पहुंच चुकी थी।
संविधान ने दिए बराबरी के अधिकार
आजादी के बाद संविधान ने महिलाओं की यात्रा को मजबूत संवैधानिक आधार दिया। अनुच्छेद 14 ने समानता, अनुच्छेद 15 ने लिंग के आधार पर भेदभाव के विरुद्ध संरक्षण और अनुच्छेद 16 ने सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता सुनिश्चित की।सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि स्वतंत्र भारत ने महिलाओं को पुरुषों के समान सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार दिया।अब महिला केवल सरकार की नीतियों से प्रभावित होने वाली नागरिक नहीं थी-वह सरकार चुनने वाली नागरिक भी थी।
संसद तक पहुंची नारी की आवाज
स्वतंत्र भारत की राजनीति में महिलाओं ने लगातार नए इतिहास बनाए। सुचेता कृपलानी पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। इंदिरा गांधी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। प्रतिभा पाटिल भारत की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं।
सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्री के रूप में प्रभावशाली भूमिका निभाई, जबकि निर्मला सीतारमण भारत की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री बनीं। ममता बनर्जी, मायावती और सोनिया गांधी जैसी महिलाओं ने भी भारतीय राजनीति में लंबे समय तक प्रभाव छोड़ा।18वीं लोकसभा में भी महिलाओं की उपस्थिति दर्ज हुई। प्रियंका गांधी वाड्रा वायनाड से निर्वाचित होकर संसद पहुंचीं और डिंपल यादव मैनपुरी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। सत्ता और विपक्ष दोनों पक्षों में महिला सांसद कानून निर्माण, बहस और जनहित के मुद्दों को उठा रही हैं।
प्रतिनिधित्व बढ़ा, लेकिन मंजिल अभी दूर
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि प्रतिनिधित्व अभी भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचा है।1952 की पहली लोकसभा में केवल 22 महिलाएं निर्वाचित हुई थीं। 2019 में यह संख्या बढ़कर 78 हुई, जबकि 2024 में 18वीं लोकसभा के लिए 74 महिलाएं निर्वाचित हुईं।
इसी अंतर को कम करने की दिशा में 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम महत्वपूर्ण कदम है। 106वें संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान किया गया है। इसका क्रियान्वयन जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा है।
असली सवाल सीटों का नहीं, आवाज का है
लेकिन महिला प्रतिनिधित्व की कहानी केवल आंकड़ों से पूरी नहीं होती। असली सवाल यह है कि संसद में पहुंची महिला कितनी प्रभावी ढंग से कानून निर्माण में भाग लेती है? अपने क्षेत्र की आवाज कितनी मजबूती से उठाती है? समाज के उन सवालों को कितनी ताकत से सामने लाती है जिन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया? लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी का अर्थ केवल संसद में संख्या बढ़ाना नहीं है। इसका अर्थ है निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की वास्तविक और प्रभावी भागीदारी।
संसद भवन अंतिम पड़ाव नहीं
लोपामुद्रा और गार्गी से लेकर लक्ष्मीबाई और सावित्रीबाई तक, और वहां से इंदिरा गांधी, प्रतिभा पाटिल, सुषमा स्वराज, निर्मला सीतारमण और आज की महिला सांसदों तक—भारतीय नारी ने हर दौर में अपनी भूमिका का विस्तार किया है।
कभी उसकी आवाज मंत्रों में सुनाई दी।
फिर वह समाज सुधार की आवाज बनी।
स्वतंत्रता आंदोलन में वह राष्ट्र की आवाज बनी।
और आज संसद में वह लोकतंत्र की आवाज है।
इसलिए वैदिक काल से संसद भवन तक की यात्रा केवल स्थान बदलने की कहानी नहीं है। यह उस आवाज के विस्तार की कहानी है, जिसे कभी घर की सीमा में बांधने की कोशिश की गई थी।
आज संसद भवन उसकी यात्रा का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि एक नया पड़ाव है। क्योंकि नारी की वास्तविक शक्ति केवल संसद की सीट में नहीं, बल्कि उस सीट से उठने वाली आवाज में है-वह आवाज जो सामाजिक प्रश्नों को कानून में, सपनों को नीति में और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को दिशा में बदल सकती है।यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है। संसद भवन केवल उसका नया पड़ाव है।
लेखक मो. सोहैल अली परास्नातक, इतिहास महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा महाराष्ट्र
प्रधान संपादक




