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August 5, 2026 12:32 am

बिलासपुर प्रेस क्लब में सात महीने बाद बदले राजनीतिक समीकरण, निष्ठा और भरोसे पर उठे सवाल

“सबसे बड़ा सवाल केवल दो पदाधिकारियों या किसी एक पैनल का नहीं है, बल्कि विश्वास का है,राजनीति और संगठन दोनों ही भरोसे की नींव पर खड़े होते हैं,यदि कोई व्यक्ति अपने ही साथियों, अपने ही पैनल और अपने ही नेतृत्व के साथ नहीं चल पाया, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि कल वह किसी और के साथ कितनी निष्ठा से चलेगा,ऐसे में प्रश्न यह भी है कि जो अपने साथियों का नहीं हुआ, उस पर आखिर कौन और किस आधार पर भरोसा करेगा? क्या केवल बदलते राजनीतिक समीकरण भरोसे की गारंटी बन सकते हैं, या फिर विश्वास वर्षों की निष्ठा, पारदर्शिता और प्रतिबद्धता से अर्जित होता है?

CBN 36 बिलासपुर। बिलासपुर प्रेस क्लब के चुनाव में जिस विकास पैनल को पत्रकारों ने स्पष्ट बहुमत देकर जिम्मेदारी सौंपी थी, उसी पैनल के भीतर अब सात महीने के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। विकास पैनल के दो पदाधिकारियों द्वारा अपने ही नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोलने से प्रेस क्लब की राजनीति एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। इस घटनाक्रम ने न केवल संगठन के भीतर हलचल बढ़ा दी है, बल्कि पत्रकारों के बीच निष्ठा, भरोसे और संगठनात्मक मर्यादा को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है।

प्रेस क्लब चुनाव के दौरान मुख्य मुकाबला विकास पैनल और आशीर्वाद पैनल के बीच था। चुनावी माहौल में एक तीसरा पैनल भी मैदान में उतरा था। उस समय कई सदस्यों के बीच यह चर्चा थी कि तीसरे पैनल के आने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया और चुनावी समीकरण प्रभावित हुए। इसके बावजूद विकास पैनल ने चुनाव जीतकर प्रेस क्लब की कमान अपने हाथों में ले ली।

चुनाव परिणाम आने के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि अब सभी मतभेद समाप्त होंगे और पूरी कार्यकारिणी प्रेस क्लब के विकास, पत्रकारों के हितों और संगठन की मजबूती के लिए एकजुट होकर काम करेगी। लेकिन महज सात महीने के भीतर ही विकास पैनल के दो पदाधिकारियों ने अपने ही नेतृत्व और साथियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से असहमति जताते हुए अलग मोर्चा खोल दिया।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चर्चित पहलू यह है कि चुनाव में विकास पैनल के खिलाफ मैदान में उतरा आशीर्वाद पैनल अब इन असंतुष्ट पदाधिकारियों के समर्थन में दिखाई दे रहा है। इतना ही नहीं, चुनाव के दौरान सक्रिय रहा तीसरा पैनल भी इस नए समीकरण का हिस्सा बताया जा रहा है। बदलते राजनीतिक समीकरणों ने प्रेस क्लब के भीतर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

संगठन के भीतर मतभेद होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है। किसी भी संस्था में विचारों का अंतर स्वाभाविक है, लेकिन जब वही मतभेद सार्वजनिक संघर्ष का रूप ले लें, तब संस्था की छवि और उसकी कार्यप्रणाली दोनों प्रभावित होती हैं। प्रेस क्लब जैसी संस्था से जुड़े पदाधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने मतभेदों का समाधान संगठन के भीतर संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से करें।

प्रेस क्लब के सदस्यों के बीच अब सबसे अधिक चर्चा एक ही सवाल को लेकर है। यदि कोई व्यक्ति अपने ही पैनल, अपने ही साथियों और अपने ही नेतृत्व के साथ लंबे समय तक नहीं चल पाया, तो क्या वह दूसरे पैनल के साथ स्थायी और भरोसेमंद संबंध बना पाएगा? क्या यह केवल परिस्थितियों के अनुसार बदलते राजनीतिक समीकरण हैं, या फिर इसके पीछे कोई बड़ा संगठनात्मक कारण है? इन सवालों के जवाब आने वाला समय ही देगा।

चुनाव में पत्रकारों ने किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरी टीम और उसके साझा विज़न पर विश्वास जताया था। ऐसे में यदि उसी टीम के भीतर सार्वजनिक टकराव की स्थिति बनती है, तो यह स्वाभाविक है कि मतदाताओं के मन में भी कई प्रश्न उठें। आखिर जिस विश्वास के आधार पर जनादेश मिला था, उसका सम्मान कैसे सुनिश्चित होगा?

प्रेस क्लब की राजनीति में आज सबसे बड़ी चर्चा किसी पद या पैनल की नहीं, बल्कि भरोसे की है। क्योंकि संगठन केवल चुनाव जीतने से नहीं चलता, बल्कि आपसी विश्वास, सामूहिक जिम्मेदारी और निष्ठा से चलता है।

यही कारण है कि अब एक सवाल लगातार पत्रकारों के बीच गूंज रहा है,यदि कोई अपने साथियों का नहीं हो सका, तो उस पर आखिर कौन और किस आधार पर भरोसा करेगा? विश्वास किसी घोषणा या नए राजनीतिक समीकरण से नहीं बनता, बल्कि वर्षों की प्रतिबद्धता, पारदर्शिता और साथ निभाने से अर्जित होता है।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विकास पैनल के भीतर पैदा हुए मतभेद संवाद से सुलझते हैं या फिर प्रेस क्लब की राजनीति में नए गठबंधन और नए समीकरण स्थायी रूप लेते हैं। फिलहाल इतना तय है कि यह विवाद केवल दो-चार पदाधिकारियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने प्रेस क्लब की राजनीति में निष्ठा, विश्वास और संगठनात्मक मूल्यों पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

प्रेस क्लब जैसी संस्था की सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास और उसकी गरिमा है। यदि व्यक्तिगत मतभेद और अवसरवादी समीकरण इस भरोसे को कमजोर करने लगें, तो नुकसान किसी एक पैनल का नहीं, बल्कि पूरे पत्रकार समाज का होता है। अंततः पद और पैनल बदलते रहते हैं, लेकिन व्यक्ति की पहचान उसके आचरण, उसकी निष्ठा और उसके निभाए गए रिश्तों से बनती है। इसलिए आने वाले समय में सब सबसे बड़ा फैसला पदों का नहीं, बल्कि विश्वास का होगा।

अंततः यह पूरा घटनाक्रम केवल पैनलों की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वास और निष्ठा की भी परीक्षा है। आज जो लोग इस नए समीकरण के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं, उन्हें भविष्य में क्या मिलेगा, यह तो समय ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि संगठन की राजनीति में सबसे बड़ी पूंजी पद नहीं, बल्कि भरोसा होता है।

संभव है इस लेख में व्यक्त विचार सभी को पसंद न आएँ। कुछ लोग इससे सहमत होंगे, कुछ असहमत। लेकिन सवाल उठाना और संगठन के भीतर चल रही गतिविधियों पर चर्चा करना लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा है। आखिरकार, प्रेस क्लब जैसे संगठन की मजबूती किसी एक व्यक्ति या पैनल से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और आपसी विश्वास से तय होती है। इतिहास गवाह है कि बदलते समीकरणों से पद तो मिल सकते हैं, लेकिन सम्मान और भरोसा केवल अपने आचरण से ही अर्जित किया जा सकता है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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