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March 30, 2026 9:20 pm

पल्लवी पायेंग की संघर्षगाथा: मां होने के साथ मेडल तक का सफर

रायपुर, 30 मार्च 2026।असम की भारोत्तोलक पल्लवी पायेंग ने पारिवारिक जिम्मेदारियों और भावनात्मक चुनौतियों के बीच संतुलन बनाते हुए खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में रजत पदक हासिल कर एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। महिलाओं के 69 किलोग्राम वर्ग में जीता गया यह पदक उनके संघर्ष, त्याग और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है।

मां बनने के बाद लिया कठिन फैसला

पल्लवी के सामने सबसे बड़ी चुनौती तब आई, जब उनकी बेटी महज छह महीने की थी। उस समय उन्हें यह निर्णय लेना पड़ा कि वे खेल को विराम दें या फिर बेटी से दूर रहकर अपने करियर को दोबारा शुरू करें। अंततः उन्होंने अपने सपनों को प्राथमिकता दी और प्रशिक्षण में वापसी का फैसला किया। इस दौरान उनके पति सुखावन थौमंग और मां ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

परिवार बना सबसे बड़ी ताकत

बीएसएफ में कार्यरत उनके पति ने हर कदम पर उनका हौसला बढ़ाया, वहीं उनकी मां ने बच्ची की देखभाल की जिम्मेदारी संभाली। पल्लवी की चार वर्षीय बेटी आज भी नानी और मां के बीच समय बिताती है, जिससे पल्लवी को अपने प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है।

संघर्ष से सफलता तक का सफर,मां बनने के बाद खेल में वापसी आसान नहीं रही

• 2023: राज्य चैंपियनशिप में छठा स्थान

• 2024: डिब्रूगढ़ प्रतियोगिता में निराशा

• 2025: तेजपुर में रजत पदक, अस्मिता लीग में स्वर्ण

• 2026: खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में रजत पदक

इन उपलब्धियों ने उनके आत्मविश्वास को नई ऊंचाई दी है।

पल्लवी का बयान

पल्लवी ने कहा कि मां बनने के बाद फिटनेस हासिल करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, जिसे केवल एक महिला ही सही मायनों में समझ सकती है। उन्होंने इसे भावनात्मक रूप से कठिन लेकिन आवश्यक निर्णय बताया।

प्रेरणा बनी पल्लवी की कहानी

पल्लवी पायेंग की यह उपलब्धि न केवल खेल जगत के लिए, बल्कि उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत है, जो परिवार और करियर के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं। उनका यह सफर यह साबित करता है कि दृढ़ निश्चय और परिवार के सहयोग से हर चुनौती को पार किया जा सकता है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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