बिलासपुर। हाई कोर्ट ने पितृत्व निर्धारण से जुड़े एक पेचीदा मामले में अहम फैसला दिया है। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की डिवीजन बेंच ने कहा कि यदि किसी महिला की पहली शादी कानूनी रूप से अस्तित्व में है, तो उस दौरान पैदा हुए बच्चों को साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत उसके कानूनी पति की ही संतान माना जाएगा। भले ही कोई अन्य पुरुष उन बच्चों को अपनी संतान स्वीकार कर ले या महिला के साथ लिव-इन में रहे, कानूनन बच्चों की वैधता पहले पति से ही जुड़ी रहेगी। दो महिलाओं ने खुद को बिलासपुर के एक कारोबारी की बेटियां और उनकी मां पत्नी के रूप में वैधता को लेकर याचिका दायर की थी।
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि महिला की पहली शादी वर्ष 1960 में हुआ था और वह विधिक रूप से कभी समाप्त नहीं हुई। पहले पति ने न तो तलाक का कोई प्रमाण प्रस्तुत किया गया और न ही पति की मृत्यु का कोई सबूत ही दिया गया। ऐसे में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 और 11 के तहत दूसरा विवाह शून्य माना जाएगा।
बिलासपुर के लिंक रोड और मुंगेली निवासी दो महिलाओं ने फैमिली कोर्ट में याचिका लगाई थी, इसमें दावा किया था कि उनकी मां का वर्ष 1971 में गोंड़पारा निवासी एक कारोबारी के साथ वरमाला विवाह हुआ था और उसी संबंध से दोनों का जन्म हुआ। तर्क दिया कि उनकी मां के पहले पति वर्ष 1984 में घर छोड़कर चले गए थे और तब से उनका कोई पता नहीं है। यह भी दावा किया कि कारोबारी ने ने अपने जीवनकाल में उन्हें बेटियों के रूप में स्वीकार किया था और कोर्ट में लिखित रूप से इस तथ्य को स्वीकार भी किया था। हालांकि फैमिली कोर्ट ने सबूतों और दस्तावेजों के आधार पर वर्ष 2019 में महिलाओं का मामला खारिज कर दिया था, इसके बाद हाई कोर्ट में अपील की गई। शेष| पेज 3
हाई कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत विवाह के दौरान जन्मे बच्चों को पति की संतान मानने की कानूनी धारणा मजबूत होती है, इसे केवल नॉन-एक्सेस यानी पति-पत्नी के बीच शारीरिक संपर्क असंभव होना साबित करके ही गलत बताया जा सकता है। इस मामले में ऐसा कोई ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया। आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेजों में भी बच्चों के पिता के रूप में पहले पति का नाम दर्ज होना इस धारणा को और मजबूत करता है।
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