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February 14, 2026 10:02 pm

हाई कोर्ट ने कहा, सिविल विवाद को आपराधिक रूप देकर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का किया है काम

बिलासपुर। संपत्ति विवाद में पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआ को हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया है। डिवीजन बेंच ने पुलिस की इस कार्रवाई को याचिकाकर्ता को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की कार्रवाई बताया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने इस टिप्पणी के साथ पुलिस द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है।

दयालबंद निवासी रामेश्वर जायसवाल व अन्य ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर कर पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि सिविल विवाद में सिरगिट्टी थाना में 8 मार्च 2024 को दर्ज एफआईआर और 22 जून 2024 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की कोर्ट में आरोप पत्र पेश किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने इसे निरस्त करने की मांग की थी। याचिका के अनुसार 27 फरवरी 2024 की शाम एक महिला दो लोगों के साथ उनके घर पहुंचीं और गाली-गलौज व जान से मारने की धमकी दी। बाद में बंगाली दादा नामक व्यक्ति के लोगों ने उन्हें धमकाया। साथ ही कहा कि मामला पूरी तरह सिविल विवाद का है। एफआईआर का उद्देश्य केवल 4.56 लाख रुपए की अवैध मांग को पूरा करवाना था। उन्होंने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता संपत्ति के कागजात लौटाने के बदले 4.56 लाख रुपए की मांग कर रहा था। वहीं, राज्य सरकार ने एफआईआर को सही बताया।
हाई कोर्ट ने सुनवाई के बाद कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल यहां अनुचित तरीके से दबाव बनाने के लिए किया गया। सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सिविल विवाद को जबरन आपराधिक रंग देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट को बेहद सतर्क रहना चाहिए।
हाई कोर्ट ने एफआईआर, आरोपपत्र और न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि इस तरह के प्रयासों को शुरुआती अवस्था में ही रोकना जरुरी है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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