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August 23, 2026 12:18 am

पत्रकार आपस में भिड़े, व्यवस्था मुस्कुराई! प्रेस क्लब में किसकी लड़ाई, किसका फायदा? क्योंकि अंत में हिसाब कुर्सी का नहीं, काम का होता है

“पत्रकारों का काम व्यवस्था से सवाल पूछना है, लेकिन जब पत्रकार ही आपस में सवाल-जवाब और व्यक्तिगत लड़ाई में उलझ जाएं तो सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है-इस लड़ाई का फायदा आखिर किसे हो रहा है?”

“सबसे चिंता की बात यही है कि जब पत्रकार आपस में लड़ते हैं, तो बाहर बैठे लोग तमाशा देखते हैं। जो अधिकारी कल तक पत्रकारों के सवालों से असहज होते थे, आज शायद यही सोचकर मुस्कुरा रहे होंगे कि “इन्हें आपस में ही उलझने दो।”

CBN36 बिलासपुर ।पत्रकारों का काम व्यवस्था से सवाल पूछना और समाज को आईना दिखाना है, लेकिन जब वही पत्रकार आपस में उलझने लगें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि इसका फायदा आखिर किसे मिल रहा है?

हाल के दिनों में प्रेस क्लब से जुड़े घटनाक्रम ने यही सवाल खड़ा कर दिया है। एक-दूसरे पर व्यक्तिगत टिप्पणियां, पुराने विवादों की चर्चा और चुनावी गुटबाजी के बीच संस्था का मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूटता दिखाई दे रहा है। स्थिति ऐसी बनती जा रही है कि लोग आपस में लड़ रहे हैं और बाहर बैठे जिम्मेदार लोग पूरे घटनाक्रम को देखकर मुस्कुराने का मौका पा रहे हैं।

लड़ाई अपनी, फायदा किसी और का

किसी भी संगठन में मतभेद होना असामान्य नहीं है। चुनाव में अलग-अलग पैनल होना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद यदि व्यक्तिगत रंजिश जारी रहती है तो सवाल उठता है कि इससे संस्था मजबूत हो रही है या कमजोर? यदि पत्रकार ही एक-दूसरे को निशाना बनाने में अपनी ऊर्जा लगा देंगे, तो फिर अधिकारियों और व्यवस्था से कठिन सवाल कौन पूछेगा? यही वह स्थिति है जिसका फायदा उन लोगों को मिल सकता है, जिन्हें पत्रकारों की एकजुट आवाज पसंद नहीं आती।

अधिकृत मंच पर मर्यादा की जिम्मेदारी किसकी?

प्रेस क्लब के अधिकृत ग्रुप में किसी पदाधिकारी अथवा पूर्व पदाधिकारी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी सामने आती है और जिम्मेदार लोग उस पर चुप रहते हैं, तो सवाल केवल टिप्पणी करने वाले पर नहीं उठता।सवाल यह भी है कि क्या संस्था के अधिकृत मंच पर किसी की गरिमा से खिलवाड़ की अनुमति दी जा सकती है? असहमति हो, आलोचना हो, चुनावी विरोध हो-सब स्वीकार्य है। लेकिन व्यक्तिगत अपमान को सामान्य मान लेना किसी भी संस्था के लिए खतरनाक संकेत है।

दो साल का कार्यकाल, लेकिन विवाद उससे भी लंबा?

पद का कार्यकाल दो वर्ष का है। आज कोई पदाधिकारी है, कल कोई और होगा। चुनाव फिर आएगा, पैनल फिर बनेंगे और मतदाता फिर फैसला करेंगे। लेकिन यदि पूरा कार्यकाल एक-दूसरे को नीचा दिखाने और पुरानी बातों का हिसाब चुकता करने में निकल गया तो संस्था के पास उपलब्धियों के नाम पर क्या बचेगा? पद दो साल का हो सकता है, लेकिन संस्था हमेशा की होती है।

चुनाव के बाद पैनल नहीं, संस्था याद रखनी चाहिए

चुनाव के समय हर उम्मीदवार अपने पैनल के लिए मेहनत करता है। समर्थक जुटाता है, प्रचार करता है और जीत के लिए रणनीति बनाता है। यह लोकतंत्र का हिस्सा है।लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद सबसे पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए-पैनल से ऊपर प्रेस क्लब और व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर पत्रकारों का हित। यदि किसी ने चुनाव में साथ दिया है तो उसका सम्मान होना चाहिए, लेकिन संस्था के फैसले किसी व्यक्ति विशेष के समर्थन या विरोध पर नहीं, बल्कि पत्रकार हित पर आधारित होने चाहिए।

साथ लेने के बाद साथ छोड़ना भी सवालों के घेरे में

यह चर्चा भी अब सुनाई दे रही है हाल ही में जिन लोगों को साथ दिया गया, वो जरूरत के समय नहीं खड़ा हुआ और कौन दूर रहा? यह बात भी आज़ चर्चा के दौरान महत्वपूर्ण रही लेकिन परेशानी के समय वो नज़र ही नहीं आए बल्कि पूछ परख भी नहीं किए यहाँ केवल उनका सवाल नहीं है। यह संगठन के भीतर विश्वास और रिश्तों की राजनीति पर बड़ा सवाल है।

पत्रकार बंटेंगे तो सवाल कमजोर होंगे

आज जरूरत इस बात की है कि पत्रकार एक-दूसरे से लड़ने के बजाय उन मुद्दों पर एकजुट हों जिनका सीधा संबंध पत्रकारिता और पत्रकारों के हित से है। क्योंकि जब पत्रकार आपस में भिड़ते हैं तो उनकी आवाज कमजोर होती है। और जब आवाज कमजोर होती है, तब व्यवस्था से जवाब मांगना भी मुश्किल हो जाता है।इसलिए समय रहते यह समझना होगा कि व्यक्तिगत बदला लेने की भावना से कोई संस्था मजबूत नहीं होती।

अब फैसला किसका?

अब फैसला पदाधिकारियों को करना है-उन्हें चुनावी खुन्नस को आगे बढ़ाना है या संस्था को आगे ले जाना है।अधिकृत ग्रुप में मर्यादा तोड़ने वाली भाषा पर रोक लगे, व्यक्तिगत विवादों को संस्था से बाहर रखा जाए और पत्रकार हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

क्योंकि अगर पत्रकार ही आपस में लड़ते रहेंगे और अधिकारी किनारे बैठकर इस लड़ाई का आनंद लेते रहेंगे, तो कल सवाल यह नहीं होगा कि कौन जीता और कौन हारा। सवाल यह होगा

इस पूरी लड़ाई में प्रेस क्लब कितना हारा? और शायद यही सवाल आज सबसे ज्यादा जरूरी है।

क्योंकि अंत में हिसाब कुर्सी का नहीं, काम का होता है।और अगर पत्रकार आपस में ही लड़ते रहे, तो याद रखिए-तमाशा हमारा होगा, फायदा किसी और का।अब भी समय है। व्यक्तिगत रंजिश को विराम दीजिए, मर्यादा कायम कीजिए और संस्था को व्यक्ति से ऊपर रखिए।वरना इतिहास यह नहीं पूछेगा कि चुनाव कौन जीता था-इतिहास यह पूछेगा कि पत्रकारों की एकजुटता किसने हराई थी।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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