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July 25, 2026 6:53 pm

सपनों की दूसरी उड़ान:42 की उम्र में एंजेल चौकसे ने जीता अंतरराष्ट्रीय ताज, साबित किया-हौसलों के आगे उम्र भी झुक जाती है

“एंजेल कहती हैं कि यदि उनके पति रितेश चौकसे उनका साथ नहीं देते, तो शायद यह सपना कभी पूरा नहीं हो पाता। पति ने केवल प्रेरित ही नहीं किया, बल्कि हर कदम पर उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। उनकी बेटी विनस चौकसे, जो एमबीबीएस की छात्रा हैं, भी लगातार उनका उत्साह बढ़ाती रहीं।माता-पिता, सास-ससुर, मित्र और प्रशिक्षकों ने भी उन्हें यह एहसास कराया कि अपने लिए जीना स्वार्थ नहीं, बल्कि आत्मसम्मान है”

By Rahul Shukla 

CBN36 छत्तीसगढ़ ।एक महिला जब आईने के सामने खड़ी होती है तो वह केवल अपना चेहरा नहीं देखती, बल्कि अपने भीतर छिपे उन सपनों को भी देखती है, जिन्हें कभी समय, कभी जिम्मेदारियों और कभी परिस्थितियों ने पीछे धकेल दिया होता है। कुछ सपने उम्र के साथ धुंधले पड़ जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो मन के किसी कोने में चुपचाप सांस लेते रहते हैं। सही समय आने पर वही सपने फिर से आंखों में चमक बनकर लौटते हैं।

बिलासपुर की एंजेल चौकसे की कहानी ऐसे ही एक सपने की कहानी है। यह कहानी केवल एक ब्यूटी पेजेंट जीतने की नहीं, बल्कि स्वयं को दोबारा पहचानने की है। यह कहानी उस आत्मविश्वास की है, जिसने 42 वर्ष की उम्र में यह साबित कर दिया कि मंजिल तक पहुंचने के लिए उम्र नहीं, बल्कि इरादे जवान होने चाहिए।

दिल्ली के होटल लीला इंटरनेशनल में आयोजित Mrs. India International Queen Alluring 2026 प्रतियोगिता में जब विजेता के रूप में एंजेल चौकसे का नाम पुकारा गया, तो वह क्षण केवल उनके जीवन का नहीं था। वह बिलासपुर, छत्तीसगढ़ और उन हजारों महिलाओं के आत्मविश्वास का क्षण था, जो अपने सपनों को जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा देती हैं।

एक सपना… जो कॉलेज से शुरू हुआ

एंजेल चौकसे को फैशन और व्यक्तित्व विकास की दुनिया हमेशा आकर्षित करती थी। कॉलेज में होम साइंस की छात्रा रहते हुए उनकी प्रतिभा को पहचान मिली और वे ‘मिस होम साइंस’ चुनी गईं। उस मंच पर मिली तालियों ने उनके भीतर एक सपना बो दिया-एक दिन बड़े मंच पर अपनी पहचान बनाने का सपना।

लेकिन जीवन हमेशा हमारी योजनाओं के अनुसार नहीं चलता।

विवाह हुआ, परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ीं, बच्चों का पालन-पोषण और घर की प्राथमिकताएं सामने आ गईं। धीरे-धीरे मंच की चमक रसोई की रोशनी में बदल गई और व्यक्तिगत सपने परिवार की खुशियों में घुलते चले गए।

यह कहानी केवल एंजेल की नहीं है। यह देश की लाखों महिलाओं की कहानी है, जो अपने सपनों को कभी त्यागती नहीं, बल्कि उन्हें कुछ समय के लिए संभालकर रख देती हैं।

जब परिवार बना सपनों का साथी

हर सफल महिला के पीछे केवल उसका संघर्ष नहीं होता, बल्कि उसका वह परिवार भी होता है जो उसके सपनों पर विश्वास करता है।एंजेल कहती हैं कि यदि उनके पति रितेश चौकसे उनका साथ नहीं देते, तो शायद यह सपना कभी पूरा नहीं हो पाता। पति ने केवल प्रेरित ही नहीं किया, बल्कि हर कदम पर उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। उनकी बेटी विनस चौकसे, जो एमबीबीएस की छात्रा हैं, भी लगातार उनका उत्साह बढ़ाती रहीं।माता-पिता, सास-ससुर, मित्र और प्रशिक्षकों ने भी उन्हें यह एहसास कराया कि अपने लिए जीना स्वार्थ नहीं, बल्कि आत्मसम्मान है।

यहीं से एंजेल की जिंदगी ने दूसरी पारी शुरू की।42 की उम्र… लेकिन जुनून 22 साल का

समाज अक्सर महिलाओं के लिए उम्र की सीमाएं तय कर देता है। एक निश्चित उम्र के बाद उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे केवल परिवार तक सीमित रहें।लेकिन एंजेल ने इन धारणाओं को चुनौती दी।उन्होंने पूरे एक वर्ष तक खुद को प्रतियोगिता के लिए तैयार किया। सुबह फिटनेस ट्रेनिंग, दिनभर अनुशासित दिनचर्या, कैटवॉक की प्रैक्टिस, पब्लिक स्पीकिंग, ग्रूमिंग, व्यक्तित्व विकास, मंच संचालन, आत्मविश्वास और मानसिक संतुलन-हर पहलू पर उन्होंने लगातार मेहनत की।

उनका हर दिन एक लक्ष्य के साथ शुरू होता था और उसी लक्ष्य के साथ समाप्त होता था।

वे कहती हैं कि सबसे कठिन मुकाबला किसी दूसरे प्रतिभागी से नहीं, बल्कि खुद से होता है। हर दिन खुद को कल से बेहतर बनाना ही उनकी सबसे बड़ी तैयारी थी।

दुनिया के बीच छत्तीसगढ़ की पहचान

दिल्ली में आयोजित यह प्रतियोगिता केवल भारत की प्रतिभागियों तक सीमित नहीं थी। इसमें सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, दुबई, कतर, अमेरिका और लंदन सहित कई देशों से प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

पांच दिनों तक चले इस आयोजन में केवल सुंदरता नहीं, बल्कि व्यक्तित्व, सोच, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक दृष्टिकोण की भी परीक्षा ली गई।कैटवॉक, टैलेंट राउंड, परिचय, प्रश्नोत्तर, ग्रूमिंग और पर्सनैलिटी असेसमेंट जैसे कई कठिन चरणों में एंजेल ने अपनी प्रतिभा और आत्मविश्वास से निर्णायकों को प्रभावित किया।जब विजेता के रूप में उनके सिर पर ताज सजा, तब वह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं रही। वह पूरे छत्तीसगढ़ के सम्मान का प्रतीक बन गई।

ताज से बड़ी थी सीख

एंजेल के अनुसार प्रतियोगिता का सबसे बड़ा पुरस्कार केवल विजेता बनना नहीं था, बल्कि विभिन्न देशों की प्रतिभागियों के साथ समय बिताना था।उन्होंने अलग-अलग संस्कृतियों, जीवनशैलियों और सोच को बहुत करीब से देखा। उन्हें महसूस हुआ कि दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए, आत्मविश्वास और मेहनत हर जगह सफलता की सबसे बड़ी भाषा है।यही अनुभव उन्हें और अधिक परिपक्व बनाकर लौटा।

महिलाओं के लिए एक संदेश

आज भी समाज में अनेक महिलाएं केवल इसलिए अपने सपनों को छोड़ देती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अब बहुत देर हो चुकी है।एंजेल इस सोच को बदलना चाहती हैं।वे कहती हैं- सपनों की कोई उम्र नहीं होती। अगर आप खुद पर विश्वास करते हैं, मेहनत करने का साहस रखते हैं और हार नहीं मानते, तो जीवन का हर पड़ाव नई शुरुआत बन सकता है।उनका यह संदेश केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जिसने कभी किसी कारण से अपने सपनों को रोक दिया हो।

सफलता के पीछे अनुशासन

एंजेल की सफलता किसी संयोग का परिणाम नहीं है।इसके पीछे नियमित व्यायाम, संतुलित जीवनशैली, मानसिक दृढ़ता, निरंतर अभ्यास और सीखते रहने की जिद है।वे मानती हैं कि सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती, बल्कि अनुशासन और निरंतरता से मिलती है।यही कारण है कि उन्होंने प्रतियोगिता के हर राउंड में स्वयं का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया।

मीडिया का आभार और समाज के प्रति जिम्मेदारी

एंजेल चौकसे ने अपनी सफलता को समाज तक पहुंचाने के लिए मीडिया का विशेष आभार व्यक्त किया। उनका कहना है कि किसी भी सकारात्मक उपलब्धि को लोगों तक पहुंचाना मीडिया की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। ऐसी कहानियां समाज में नई ऊर्जा और प्रेरणा का संचार करती हैं।उन्होंने अपनी जीत को बिलासपुर और पूरे छत्तीसगढ़ की जनता को समर्पित करते हुए कहा कि यह सम्मान केवल उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की बेटियों और महिलाओं का सम्मान है।

नई पीढ़ी के लिए मिसाल

आज एंजेल चौकसे केवल एक ब्यूटी क्वीन नहीं हैं। वे उन महिलाओं का चेहरा बन गई हैं जो अपने सपनों को फिर से जीना चाहती हैं।उनकी कहानी यह बताती है कि जीवन में कभी भी नई शुरुआत की जा सकती है। परिवार और करियर साथ-साथ चल सकते हैं। जिम्मेदारियां सपनों की दुश्मन नहीं होतीं, यदि परिवार साथ खड़ा हो।

एंजल इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि आत्मविश्वास, सकारात्मक सोच और निरंतर मेहनत किसी भी व्यक्ति की पहचान बदल सकती है।

जीवन में कुछ जीतें ट्रॉफियों से बड़ी होती हैं। वे लोगों की सोच बदल देती हैं।

एंजेल चौकसे की यह जीत भी ऐसी ही जीत है। यह एक ताज की कहानी नहीं, बल्कि उस विश्वास की कहानी है जिसने यह साबित कर दिया कि सपनों का कोई जन्म प्रमाण पत्र नहीं होता, उनकी कोई उम्र नहीं होती और उनकी कोई समय-सीमा नहीं होती।जब एक साधारण गृहिणी अंतरराष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ का नाम रोशन करती है, तब वह केवल एक प्रतियोगिता नहीं जीतती-वह समाज की उस सोच को भी जीत लेती है, जो महिलाओं के सपनों की उम्र तय करती है।

एंजेल चौकसे की यह यात्रा हर उस बेटी, हर उस मां, हर उस गृहिणी और हर उस महिला के लिए प्रेरणा है, जिसने कभी अपने सपनों को अलमारी के किसी कोने में संभालकर रख दिया था।

क्योंकि सच यही है ,सपनों की कोई उम्र नहीं होती… उन्हें पूरा करने के लिए सिर्फ हौसले चाहिए।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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