अधिकारियों की नियुक्तियों को लेकर फैलाया जा रहा भ्रम, इंटेलिजेंस आईजी को न तो पोस्टिंग का अंतिम अधिकार और न ही वित्तीय स्वीकृति का

सरकार की सख्ती से घबराए तत्व सक्रिय, पुलिस और प्रशासन की छवि पर हमले तेज
प्रदेश में मजबूत पुलिसिंग से हताश असामाजिक तत्व, रायपुर दुर्ग बिलासपुर, जशपुर में नियंत्रण मजबूत, ले रहे अफवाहों का सहारा

रायपुर।छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय सरकार के गठन के बाद नक्सलवाद, संगठित अपराध और अवैध गतिविधियों के खिलाफ तेज हुई कार्रवाई से कुछ असंतुष्ट और प्रभावित समूहों में बेचैनी साफ दिखाई देने लगी है। प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक इसी बेचैनी के चलते बीते दिनों सोशल मीडिया और कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से सरकार, गृह विभाग और पुलिस अधिकारियों को लेकर भ्रम और अविश्वास फैलाने की सुनियोजित कोशिशें शुरू हुई हैं।सूत्रों का कहना है कि इन प्रयासों का उद्देश्य कानून-व्यवस्था पर काम कर रहे तंत्र का मनोबल तोड़ना और आमजन में सरकार के प्रति शंका पैदा करना है।
डिजिटल नेटवर्क बना दुष्प्रचार का औजार,जवाबदेही तय करने की नीति को विफलता’ बताने का खेल
प्रशासन से जुड़े जानकारों के अनुसार कुछ ऑनलाइन पोर्टल और सोशल मीडिया अकाउंट्स लगातार ऐसी सामग्री प्रसारित कर रहे हैं, जिनका तथ्यात्मक आधार कमजोर है। ये मंच पूर्व में भी गलत जानकारियां फैलाने के आरोपों में घिर चुके हैं और कई मामलों में कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहे हैं।
इसके बावजूद इन माध्यमों के जरिए राज्य की कानून-व्यवस्था को विफल साबित करने का प्रयास किया जा रहा है।
तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर कानून-व्यवस्था को फेल साबित करने की साजिश,घटनाओं पर सरकार ने दिखाई त्वरित सख्ती
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि जहां भी कानून-व्यवस्था से जुड़ी घटनाएं सामने आईं, वहां सरकार ने त्वरित संज्ञान लेते हुए जिम्मेदारी तय की है चाहे बलौदाबाजार की घटना हो या अन्य संवेदनशील मामले हर जगह कार्रवाई, समीक्षा और सुधार के कदम उठाए गए।सूत्र बताते है कि जवाबदेही तय करने की यही प्रक्रिया कुछ लोगों को असहज कर रही है, जिसे कमजोरी के रूप में प्रचारित करने की कोशिश हो रही है।
मजबूत पुलिसिंग से हताश असामाजिक तत्व, रायपुर दुर्ग बिलासपुर, जशपुर में नियंत्रण मजबूत, इसलिए अफवाहों का सहारा
प्रदेश की राजधानी रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर जशपुर मुंगेली बलौदा सरगुजा सहित कई जिलों में पुलिस और प्रशासनिक अमले के बीच बेहतर तालमेल देखने को मिल रहा है। अपराध नियंत्रण महिला सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के मामलों में इन जिलों की स्थिति संतोषजनक बताई जा रही है।यही नहीं प्रदेश के संभाग मुख्यालयों में नज़र डाले तो बेहतर पुलिसिंग हो रही है इसमें से तो कुछ जिले पुलिसिंग के मामले में टॉप पर है।सूत्र बताते है कि जिन क्षेत्रों में असामाजिक गतिविधियों को पनपने का मौका नहीं मिल पा रहा वहीं से दुष्प्रचार की आवाजें ज्यादा तेज हो रही हैं।
अधिकारियों की नियुक्तियों को लेकर फैलाया जा रहा भ्रम इंटेलिजेंस आईजी को न तो पोस्टिंग का अंतिम अधिकार है और न ही वित्तीय स्वीकृति का
सूत्रों के अनुसार प्रशासनिक नियुक्तियों को लेकर भी जानबूझकर भ्रम पैदा किया जा रहा है। इंटेलिजेंस आईजी को न तो पोस्टिंग का अंतिम अधिकार है और न ही वित्तीय स्वीकृति का और ऐसे में बिना किसी एफआईआर, विजिलेंस जांच या न्यायिक पुष्टि के 1–1.5 करोड़ की वसूली जैसे आरोप मानहानि के दायरे में है ।जबकि जमीनी हकीकत इसके उलट है ,सरकार अधिकारियों की तैनाती में केवल अनुभव, कार्यक्षमता और सेवा रिकॉर्ड को आधार बनाती है। अधिकारियों का कहना है कि जिले की भौगोलिक स्थिति, सामाजिक संरचना, अपराध की प्रकृति और कानून-व्यवस्था की संवेदनशीलता के आधार पर यह तय किया जाता है कि किस जिले में किस श्रेणी के अधिकारी की तैनाती उपयुक्त रहेगी।
जिलों के पुलिस अधीक्षकों एसपी की तैनाती किसी व्यक्ति विशेष की पसंद या निर्णय पर निर्भर नहीं होती, बल्कि यह सेवा नियमों अधिकारियों के अनुभव और प्रशासनिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए की जाती है। पुलिस मुख्यालय और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार राज्य में डायरेक्ट आईपीएस और राज्य पुलिस सेवा से प्रमोट हुए अधिकारी दोनों ही इस व्यवस्था के अहम स्तंभ हैं।इस विषय को लेकर फूट डालने की कोशिश को गंभीरता से देखा जा रहा है।
तथ्यों की हत्या कर परोसी जा रही सनसनी,आत्महत्या को हत्या, जांच को फैसला बताकर भ्रम फैलाने का आरोप
पुलिस सूत्रों के अनुसार कुछ मामलों में घटनाओं की प्रकृति को बदलकर प्रस्तुत किया गया, जिससे भ्रम की स्थिति बनी। आत्महत्या जैसे प्रकरणों को हत्या बताकर या जांचाधीन मामलों को निष्कर्ष की तरह पेश कर प्रशासन को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई।इसी तरह व्यक्तिगत विवादों को पूरे पुलिस तंत्र से जोड़ने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठ रहे हैं।
वर्दी पर सीधा वार, जवानों का मनोबल तोड़ने की चाल,फील्ड में तैनात पुलिस बल पर झूठे प्रचार का मनोवैज्ञानिक दबाव
पुलिस मुख्यालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि बिना प्रमाण फैलाई जा रही खबरों का असर सीधे ग्राउंड पर काम कर रहे जवानों पर पड़ता है। दुर्गम इलाकों में तैनात बल और महिला आरक्षकों तक पर इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है, जो बेहद चिंताजनक है। संवेदनशील इलाकों में काम कर रहे जवानों से लेकर महिला आरक्षकों तक, सभी का मनोबल प्रशासन की निष्पक्ष छवि से जुड़ा होता है।ऐसे में भ्रामक प्रचार को केवल सरकार ही नहीं, समाज के लिए भी नुकसानदेह माना जा रहा है।
सख्त शासन से घबराए लोग अब अफवाह को हथियार बना रहे हैं
इस संबंध में जब प्रशासनिक विशेषज्ञों से बातचीत कर समझने का प्रयास किया गया तो उनका साफ़ कहना था कि सरकार की आक्रामक और जवाबदेह कार्यशैली से परेशान तत्व अब अफवाह और दुष्प्रचार के जरिए दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे समय में तथ्यों पर आधारित जानकारी और जिम्मेदार पत्रकारिता ही इस अभियान का सबसे बड़ा जवाब है।
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