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October 17, 2026 8:12 pm

वर्धा में साकार हुआ बंगाल के दुर्गा पूजा का मिनी दृश्य

रेलवे इंस्टीट्यूट में शारदीय उत्सव का शुभारंभ, स्मारिका ‘चतुरंग’ का विमोचन

CBN36 वर्धा, 17 अक्टूबर। बंगाल का दुर्गा पूजा उत्सव अपनी भव्यता, सांस्कृतिक विविधता और परंपराओं के लिए विश्वविख्यात है। षष्ठी से दशमी तक चलने वाले इस पांच दिवसीय उत्सव की झलक वर्धा शहर में भी देखने को मिल रही है। यहां निवासरत बंगाली परिवारों की ओर से रेलवे इंस्टीट्यूट में आयोजित सार्वजनिक दुर्गा पूजा उत्सव के माध्यम से श्रद्धालु बंगाल की पूजा परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का अनुभव कर रहे हैं।

विधिवत पूजा-अर्चना के साथ महापर्व का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर दुर्गा पूजा के उपलक्ष्य में प्रकाशित स्मारिका ‘चतुरंग’ का विमोचन भी हुआ। उत्सव के दौरान विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ सामाजिक सरोकारों से जुड़े आयोजन भी किए जा रहे हैं। इसी क्रम में मूक-बधिर बच्चों के साथ महाप्रसाद ग्रहण करने का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। साथ ही शारदा मूक-बधिर विद्यालय के विद्यार्थियों को निःशुल्क स्कूल बैग वितरित किए जाएंगे।

धुनुचि नृत्य और सिंदूर खेला हैं खास आकर्षण

बंगाली दुर्गा पूजा की दो प्रमुख परंपराएं विशेष आकर्षण का केंद्र होती हैं। इनमें पहली है धुनुचि नृत्य, जो आरती के दौरान किया जाता है। इसमें महिला और पुरुष हाथों में धुनुचि यानी धूप जलाने वाला पारंपरिक पात्र लेकर लयबद्ध और कलात्मक नृत्य करते हैं। धुएं, संगीत और भक्ति के संगम से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

दूसरी प्रमुख परंपरा है सिंदूर खेला, जो विजयादशमी के दिन मनाई जाती है। इस अवसर पर विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे के माथे, मांग तथा चेहरे पर सिंदूर लगाकर सुख, सौभाग्य और मंगलकामना व्यक्त करती हैं। यह परंपरा महिलाओं के आपसी स्नेह, उल्लास और सामुदायिक एकता का प्रतीक है।

आयोजन में सामाजिक समरसता का संदेश

दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आनंद, उत्साह, संस्कृति और एकता का पर्व भी है। वर्धा में आयोजित यह उत्सव बंगाली समाज की परंपराओं को जीवंत बनाए रखने के साथ ही सामाजिक सहभागिता और सेवा भावना का संदेश दे रहा है।

कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए पूजा समिति के संरक्षक अंकित कुमार मिश्र के साथ असीम चक्रवर्ती, डॉ. आलोक विश्वास, एच.एन. घोष, अर्नब नाग, अनु मुखर्जी, डॉ. अनिर्बाण घोष, डॉ. अमित विश्वास, शुभाशीष चटर्जी, प्रकाश मजूमदार, प्रदीप मजूमदार, डॉ. सैकत विश्वास, दिलीप चक्रवर्ती, विमल डे, बी.एन. दास, प्रोबीर नंदी, आर.के. बर्मन, अभिषेक कुण्डू, धनंजय भट्टाचार्य और सत्यम अधिकारी सहित अनेक सदस्य सहयोग कर रहे हैं। आयोजन की तैयारियों में विभिन्न समितियां महीनों से जुटी हुई हैं।

मां दुर्गा की विदाई के समय जहां भक्तों के मन में बिछोह की पीड़ा होती है, वहीं अगले वर्ष मां के पुनः आगमन की आशा भी बनी रहती है। बंगाली समाज की यही भावना ‘आबार एशो माँ’ यानी ‘मां, फिर आना’ के भावपूर्ण उद्घोष में अभिव्यक्त होती है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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