राज्य शासन और पीएससी को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश, याचिका की ग्राह्यता पर उठी आपत्ति
CBN36 बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में सरकारी नौकरियों में दिव्यांगों के लिए आरक्षित पदों में अंधत्व और कम दृष्टि वाले दिव्यांगों के लिए पृथक आरक्षण नहीं दिए जाने का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। बुधवार को जस्टिस एके प्रसाद की बेंच ने मामले में राज्य शासन और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (पीएससी) को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने याचिका की ग्राह्यता के सवाल को फिलहाल खुला रखा है।
भिलाई निवासी विवेक सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि छत्तीसगढ़ पीएससी की ओर से जारी कई भर्ती विज्ञापनों में दिव्यांग आरक्षित पदों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने के बजाय एक ही श्रेणी में रखा जा रहा है। याचिका में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 33 और 34 का हवाला दिया गया है।
4 प्रतिशत आरक्षण में एक प्रतिशत अंधत्व और कम दृष्टि के लिए
याचिकाकर्ता के अनुसार अधिनियम के तहत सरकारी नियुक्तियों में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए चार प्रतिशत पद आरक्षित हैं। धारा 34 में अंधत्व या कम दृष्टि वाले दिव्यांग व्यक्तियों के लिए एक प्रतिशत पद आरक्षित किए जाने का प्रावधान है। उनका आरोप है कि राज्य में इस प्रावधान के अनुरूप पृथक पद निर्धारित नहीं किए जा रहे हैं।
एक ही श्रेणी में कई प्रकार की दिव्यांगता
याचिका में पीएससी के कई भर्ती विज्ञापनों का हवाला देते हुए कहा गया है कि यदि किसी पद पर दो पद दिव्यांगों के लिए आरक्षित हैं तो उसमें हाथ, पैर, अंधत्व या कम दृष्टि और श्रवण दिव्यांगता जैसी अलग-अलग श्रेणियों को एक साथ शामिल किया जा रहा है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसी स्थिति में अंधत्व या कम दृष्टि वाले अभ्यर्थियों को अन्य श्रेणी के दिव्यांग अभ्यर्थियों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। इससे उन्हें नुकसान हो सकता है और धारा 34 में दिए गए पृथक आरक्षण का उद्देश्य भी प्रभावित होता है।
अधिवक्ता ने दूसरे राज्यों और केंद्र का दिया उदाहरण
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने कोर्ट को बताया कि मध्य प्रदेश, ओडिशा और केंद्र सरकार की यूपीएससी की परीक्षाओं में अंधत्व और कम दृष्टि वाले दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था की जा रही है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में भी कानून के अनुरूप इसी तरह की व्यवस्था की जानी चाहिए।
राज्य और पीएससी ने उठाई याचिका की ग्राह्यता पर आपत्ति
राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता आनंद ददरिया और छत्तीसगढ़ पीएससी की ओर से अधिवक्ता सुदीप अग्रवाल ने याचिका की ग्राह्यता पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि याचिकाकर्ता फिलहाल किसी परीक्षा में शामिल नहीं हो रहा है। ऐसे में उसके द्वारा मांगा गया आदेश जनहित याचिका की प्रकृति का है और मौजूदा याचिका इस रूप में सुनवाई योग्य नहीं है।
याचिकाकर्ता ने कहा- पुराने नुकसान से भी प्रभावित
इस पर याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि छत्तीसगढ़ में पहले हुई परीक्षाओं में भी यदि कानून के अनुरूप अलग आरक्षण नहीं दिया गया है तो उससे पदों का नुकसान हुआ है और याचिकाकर्ता भी उस नुकसान से प्रभावित है। इसलिए याचिका को सुनवाई योग्य माना जाना चाहिए।
चार सप्ताह बाद होगी अगली सुनवाई
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस एके प्रसाद ने याचिका की ग्राह्यता के प्रश्न को खुला रखते हुए राज्य शासन और पीएससी को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।
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