ये तो एवरग्रीन बहाना है
विधानसभा का मानसून सत्र चल रहा है। यह सत्र छोटा है। सत्र का आज अंतिम दिन है। पांच दिनों के सत्र में अफसरों से लेकर मातहतों ने गजब की चालाकी दिखाई। दफ्तर में नजर तो आए, मजाल आपका कोई काम हो गया हो। होता भी कैसे, विधानसभा अर्जेंट का बोर्ड जो टेबल के सामने लगा रखे थे। कुछ बोले नहीं कि,सिर पर हाथ कर स्टाइल से, अरे क्या बताएं अभी तो विधानसभा से ही फूर्सत नहीं है। मानो पूरा बोझ इनके कंधों पर ही रख दिया हो। अंदाज भी ऐसा कि देखने वाले भी समझ ही जाएं कि ये तो एवरग्रीन बहानेबाजी है। खैर काम नहीं करना था, सो किए ही नहीं। चलिए आज विधानसभा सत्र भी पूरा हो जाएगा। देखते हैं, सोमवार से काम करते हैं या फिर विधानसभा के कामकाज की थकान मिटाते हैं।
तबादलों का दौर और उसी अंदाज में अटकलबाजी भी
तबादलों का दौर रह-रहकर चल ही रहा है। पुलिस कमिश्नरेट से लेकर मंत्रालय में यह दौर चल ही रहा है। अधिकारी से लेकर कर्मचारी अपना जुगाड़ भी लगा रहे हैं। न्यायधानी से लेकर राजधानी तक, संभावनाएं तलाशने वाले अभी भी संभावनाएं तलाश ही रहे हैं। राजधानी की तर्ज पर न्यायधानी में भी पहुंच वालों के बंगलों में भीड़ जुटने लगी है। या यूं कहें कि बंगला अभी से गुलजार होने लगा है। बढ़ती भीड़ को मैनेज करने वाले अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा भी रहे हैं और आगे का रास्ता भी बता रहे हैं, रास्ता भी ऐसा जहां काम हो ही जाएगा। काम हो ही जाएगा का मतलब तो आप भलीभांति समझ ही रहे होंगे।
हवाई सेवा और सियासत
विधानसभा के मौजूदा मानसून सत्र के दौरान एक ऐसा भी सीन देखने को मिला, जिसे देखने और सुनने वाले अपने आपको असहज महसूस कर रहे होंगे। हवाई सुविधा जन संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने सीएम से मुलाकात की। मुलाकात का एक ही मकसद, बिलासा एयरपोर्ट में सुविधाओं का विस्तार हो। मिलाने वाले महानुभाव कौन-कौन थे। सत्ताधारी दल के दो विधायक। मुलाकात की जिसने भी तस्वीरें देखी, चर्चा किए बिना नहीं रह पाए। सोशल मीडिया के दौर में कमेंट्स भी उसी अंदाज में आने लगे। सवाल उठने लगा है, दो ही क्यों। विधानसभा सत्र का दौर था, बिलासपुर जिले के सभी विधायक वहां मौजूद थे। फिर दो चेहरे ही क्यों। सवाल तो उठ ही रहे हैं, जवाब आपको खोजना है।
नो फंड, इसलिए नहीं बनेगा आदर्श ग्राम
विधायक आदर्श ग्राम, सांसद आदर्श ग्राम, ये सब आपने सुना ही होगा और ग्रामों को आदर्श बनते देखा भी होगा। आदर्श ग्राम के रहवासी तो सुख भोग ही रहे हैं और अपना अनुभव भी बांट रहे हैं। इस बार सरकारी खजाने में इतना फंड नहीं है, विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र के गांव को आदर्श बना सके। जो सिस्टम चल रहा था उसमें एक विधायक को पांच साल में पांच गांव को मॉडल के रूप में विकसित करने और आदर्श ग्राम बनाने का मौका मिलता था। यही सिस्टम सांसदों के लिए भी था। मतलब ये कि लोकसभा क्षेत्र के 10 गांव पांच साल में मॉडल गांव बन ही जाता था। इस बार फंड नहीं है। इसलिए विकास कार्यों से ही काम चलाना होगा।
अटकलबाजी
हवाइ सेवा जन संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने सीएम से मुलाकात के बहाने ऐसी कौन सी राजनीतिक कर दी, जिसकी चर्चा मुलाकात के बाद ज्यादा हो रही है। इसे संयोग कहें या फिर जानबुझकर किया गया काम।
तबादलों के मौजूदा दौर में मंत्रियों के बंगलों में भीड़ जुटने लगी है। भीड़ और काम वालों को मैनेज करने का जिम्मा भी मिल गया है। जरा पता करिए, कौन इन और कौन-कौन आउट हो गए हैं।
प्रधान संपादक


