वर्धा। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के मानवविज्ञान विभाग के संकाय सदस्य डॉ. निशीथ राय ने कहा है कि भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य निर्धारित समय से पहले हासिल कर उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त की है, लेकिन अब आगे की नीति में 2G (कृषि अवशेष आधारित) इथेनॉल को प्राथमिकता देना आवश्यक है, ताकि जल संसाधनों और खाद्य सुरक्षा पर अनावश्यक दबाव न बढ़े।
डॉ. राय ने कहा कि भारत सरकार के अनुसार वर्ष 2014-15 से अब तक इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के कारण देश ने लगभग 1.44 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत की है तथा करीब 245 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात की आवश्यकता कम हुई है। उनका कहना है कि इससे किसानों की आय बढ़ी है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 में भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान ग्लोबल बायोफ्यूल्स एलायंस की स्थापना भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही।
डॉ. राय ने कहा कि नीति आयोग के अध्ययन के अनुसार गन्ना आधारित इथेनॉल पेट्रोल की तुलना में लगभग 65 प्रतिशत तथा मक्का आधारित इथेनॉल करीब 50 प्रतिशत कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करता है। हालांकि उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय लाभों के साथ जल उपयोग का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उन्होंने बताया कि सरकारी अध्ययनों के अनुसार एक लीटर गन्ना आधारित इथेनॉल के उत्पादन में लगभग 4,670 लीटर, मक्का आधारित इथेनॉल में 3,630 लीटर तथा चावल आधारित इथेनॉल में 10,790 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। उनके अनुसार जल संकट झेल रहे भारत के लिए यह एक गंभीर चुनौती है।
डॉ. राय ने कहा कि इसी कारण सरकार मक्का आधारित इथेनॉल को बढ़ावा दे रही है, क्योंकि इसमें गन्ने और चावल की तुलना में कम पानी लगता है। उन्होंने बताया कि पिछले तीन वर्षों में इथेनॉल उत्पादन में मक्के की हिस्सेदारी लगभग 6 प्रतिशत से बढ़कर करीब 50 प्रतिशत हो गई है। वहीं ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों से गन्ने की खेती में भी जल उपयोग कम किया जा सकता है।
उन्होंने ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2025-26 के पहले छह महीनों में देश में लगभग 515 करोड़ लीटर इथेनॉल की आपूर्ति हुई, जिसमें अधिकांश हिस्सा प्रथम पीढ़ी (1G) अर्थात फसल आधारित इथेनॉल का था। उनके अनुसार कृषि अवशेषों से बनने वाले द्वितीय पीढ़ी (2G) इथेनॉल का योगदान अभी बहुत सीमित है।
डॉ. राय ने कहा कि यदि देश E20 से आगे बढ़कर E25 अथवा E30 की दिशा में जाता है तो अतिरिक्त इथेनॉल की मांग पूरी करने के लिए अधिक मात्रा में मक्का, चावल और गन्ने की आवश्यकता होगी। इससे कृषि भूमि, सिंचाई जल और खाद्य आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इथेनॉल के लिए उपयोग किया जा रहा अनाज मुख्यतः अधिशेष भंडार और सीमित हिस्से से लिया जा रहा है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर तत्काल कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ रहा है।
डॉ. राय ने कहा कि दीर्घकालिक समाधान कृषि अवशेष आधारित 2G इथेनॉल है। उनके अनुसार भारत में प्रतिवर्ष बड़ी मात्रा में पराली जलाई जाती है, जिसका उपयोग इथेनॉल उत्पादन में किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि पंजाब के भटिंडा तथा हरियाणा के पानीपत में स्थापित 2G इथेनॉल संयंत्र इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल हैं, लेकिन देशभर में ऐसे संयंत्रों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि सरकार को 2G इथेनॉल संयंत्रों का विस्तार, पराली की गारंटीशुदा खरीद, स्थानीय संग्रहण एवं भंडारण व्यवस्था तथा किसानों को उचित मूल्य सुनिश्चित करने जैसे कदम उठाने चाहिए। इससे पेट्रोल आयात पर निर्भरता घटेगी, किसानों की अतिरिक्त आय बढ़ेगी, कार्बन उत्सर्जन कम होगा और पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण में भी कमी आएगी।
डॉ. राय ने कहा कि भारत की इथेनॉल नीति सही दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन भविष्य में 1G इथेनॉल के बजाय 2G इथेनॉल को प्राथमिकता देना अधिक टिकाऊ और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहतर विकल्प होगा।
प्रधान संपादक


