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March 19, 2026 8:38 pm

युद्ध की जलवायु कीमत: सैन्य कार्बन एमिशन का ‘काला सच’

(निशीथ राय)

संकाय सदस्य मानव विज्ञान विभाग,महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

जब दुनिया के किसी कोने में मिसाइलें गिरती हैं, तो हम अक्सर सिर्फ गिरती इमारतों, मरने वालों की गिनती और आर्थिक नुकसान का ही हिसाब लगाते हैं। लेकिन इस तबाही का एक ऐसा पहलू भी है जो दिखता नहीं, सुनाई नहीं देता, और फिर भी हर इंसान, जानवर और पेड़-पौधे पर सीधे असर डालता है और वो है युद्ध की जलवायु ‘कीमत’। आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के ऐसे खतरनाक मोड़ पर खड़ी है, जहां अमेरिका, रूस या मिडिल ईस्ट में फटने वाले किसी भी बम का असर सिर्फ उसी इलाके तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने का एक मुख्य कारक भी है।
इस अदृश्य खतरे की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ अमेरिका, चीन और रूस की सेनाओं का कार्बन उत्सर्जन ही दुनिया के सभी कमर्शियल हवाई जहाजों के कुल उत्सर्जन का दोगुना है। यह आंकड़ा 140 करोड़ की आबादी वाले पूरे अफ्रीकी महाद्वीप के कुल उत्सर्जन से भी ज्यादा है। अकेले अमेरिका के रक्षा विभाग पर गौर करें तो यह अमेरिकी सरकार की सबसे बड़ी तेल-कोयला खपत करने वाली संस्था है। मैगजीन ‘डाउन टू अर्थ’ के मुताबिक, 2001 से अब तक अमेरिकी सरकार जितनी ऊर्जा खर्च करती है, उसका 80 फीसदी हिस्सा अकेले सेना ही खा जाती है। एक F-35 लड़ाकू विमान सिर्फ एक घंटे की उड़ान में करीब 5,600 लीटर ईंधन जलाकर पर्यावरण पर भारी बोझ डाल देता है।
इतने विशाल उत्सर्जन के बावजूद ये खतरनाक आंकड़े हमारी जलवायु रिपोर्ट से हमेशा गायब रहते हैं। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय संधियों की एक बड़ी खामी है। साल 1997 के ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ में सैन्य उत्सर्जन को जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) रिपोर्टिंग से पूरी तरह छूट (exempt) दे दी गई थी। इसके बाद 2015 के ‘पेरिस समझौते’ (Paris Agreement) में भी इसे केवल स्वैच्छिक (voluntary) रखा गया । यानि कोई देश अगर अपनी मिलिटरी के कार्बन उत्सर्जन बताना चाहता है तो उसकी खुद की मर्जी है और ऐसे में आप जानते हैं कि ज्यादातर देशों ने क्या किया होगा। अमेरिका का डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस दुनिया का सबसे बड़ा ओयल कंजूमर है पर क्योंकि रिपोर्टिंग ‘स्वैच्छिक’ है इसलिए ये नंबर क्लाइमेट बैलेंस शीट से अकसर गायब रहते हैं।
युद्ध सिर्फ लड़ते वक्त ही नहीं, बल्कि खत्म होने के बाद भी पर्यावरण को गहरे घाव देते हैं। शहरों को तबाह करने में चंद दिन लगते हैं, लेकिन उन्हें दोबारा बसाने में जितना कार्बन निकलता है, वह किसी देश के सालाना उत्सर्जन से कहीं ज्यादा होता है। साल 2025 में छपी एक रिसर्च ‘एनवायर्नमेंटल रिसर्च: इंफ्रास्ट्रक्चर एंड सस्टेनेबिलिटी’ के मुताबिक, यूक्रेन के पुनर्निर्माण में करीब 74 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड निकलेगी। यह यूक्रेन के युद्ध से पहले के सालाना उत्सर्जन से चार गुना ज्यादा है। वहीं गाजा में इजराइल-हमास युद्ध के पहले 15 महीने और उसके बाद होने वाले पुनर्निर्माण का कुल कार्बन उत्सर्जन 3.2 करोड़ टन से ज्यादा है, जो स्वीडन या पुर्तगाल जैसे देशों के सालाना उत्सर्जन से भी कहीं ज्यादा है।
इन लगातार हो रहे उत्सर्जनों का सीधा असर हमारे वैश्विक तापमान पर साफ दिख रहा है। कोपरनिकस (Copernicus) और यूरोपीय मध्यम-श्रेणी मौसम पूर्वानुमान केंद्र (ECMWF) के के ताजा आंकड़े बताते हैं कि साल 2025 रिकॉर्ड पर तीसरा सबसे गर्म साल रहा है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि 2023 से 2025 के बीच का औसत तापमान पहली बार पूर्व-औद्योगिक काल के तापमान से 1.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया। यह वही खतरनाक सीमा है, जिसे पार करने से बचने की बात वैज्ञानिक सालों से कह रहे थे।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हर देश को अपनी सुरक्षा के लिए सेना रखनी चाहिए, यह बेहद जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि आजकल दुनिया भर में जो संघर्ष हम देख रहे हैं, क्या वे सच में सुरक्षा के लिए हैं या फिर एक-दूसरे पर वर्चस्व कायम करने के लिए? जब एक आम आदमी को प्लास्टिक इस्तेमाल करने पर आर्थिक दंड लगाया जा सकता है, तो क्या ताकतवर देशों की सेनाओं को धरती के प्रति जवाबदेह नहीं ठहराया जाना चाहिए? ‘सुरक्षा’ के नाम पर लड़े जा रहे ये युद्ध क्या सच में हमें सुरक्षित कर रहे हैं, या फिर हमारे अपने अस्तित्व के लिए ही सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं? और क्या अब वक्त नहीं आ गया कि संयुक्त राष्ट्र सैन्य उत्सर्जन की रिपोर्टिंग को ‘स्वैच्छिक’ की जगह ‘अनिवार्य’ कर दे?

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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