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February 23, 2026 3:18 am

पारदर्शिता से जवाबदेही की ओर: भारत की खाद्य सुरक्षा संरचना में एआई की भूमिका

(संजीव चोपड़ा)

पिछले एक दशक के दौरान, भारत ने अभूतपूर्व पैमाने पर अपनी खाद्य सुरक्षा संरचना का डिजिटलीकरण किया है। खरीद एवं भंडारण से लेकर परिवहन, वितरण और सब्सिडी के निपटारे तक, मूल्य श्रृंखला का हर चरण अब डिजिटल प्रणालियों द्वारा संचालित है। यह व्यवस्था निरंतर संचालन से जुड़े आंकड़े सृजित करने के साथ-साथ ही हर महीने लगभग 80 करोड़ लाभार्थियों को सेवा प्रदान कर रही है।

शासन संबंधी अगली चुनौती इस पारदर्शिता को प्रशासनिक जवाबदेही में बदलना है। सिर्फ दृश्यता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इस प्रणाली को पैटर्न की व्याख्या करने, जोखिमों को प्राथमिकता देने और समय पर प्रतिक्रिया देने में भी समर्थ होना चाहिए। इस बदलाव को देखते हुए, केन्द्र सरकार पूरी प्रणाली में निर्णय लेने की प्रक्रिया को मजबूत करने के उद्देश्य से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग कर रही है।

खरीद प्रक्रिया के दौरान, भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को कुटाई के बाद आपूर्ति किए गए चावल की गुणवत्ता का आकलन टूटे हुए दानों के प्रतिशत, अशुद्धियों और रंग में बदलाव जैसे निर्धारित मापदंडों के आधार पर दृश्य आधारित मूल्यांकन पर निर्भर करता है। बड़े पैमाने पर, मानवीय व्यक्तिपरकता के कारण नतीजे भिन्न हो सकते हैं। इसलिए, एआई से लैस स्वचालित अनाज विश्लेषक (एजीए) का उपयोग तस्वीर-आधारित विश्लेषण के जरिए इन मापदंडों का आकलन करने हेतु किया जा रहा है। माप को मानकीकृत और व्यक्तिपरकता को कम करके, ये प्रणालियां मौजूदा खरीद मानदंडों के भीतर काम करते हुए गुणवत्ता के सत्यापन में निरंतरता को बेहतर बना रही हैं।

एफसीआई और सेंट्रल वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन (सीडब्ल्यूसी) द्वारा संचालित भंडारण केन्द्रों में, निगरानी को मजबूत करने हेतु आईओटी-आधारित निगरानी प्रणालियों की शुरुआत की जा रही है। सेंसर तापमान, आर्द्रता, फॉस्फीन और कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर को मापते हैं, जबकि एआई से लैस कंप्यूटर विजन टूल स्वचालित तरीके से बोरियों की गिनती और स्टॉक के सत्यापन में सहायता करते हैं। ये प्रणालियां माल-सूची (इन्वेंट्री) और पर्यावरणीय स्थितियों से संबंधित निरंतर आंकड़े सृजित करती हैं। डीएफपीडी के वेयरहाउस ग्रेडिंग प्लेटफॉर्म, डिपो दर्पण के साथ एकीकृत, इस आंकड़े का विश्लेषण प्रिडिक्टिव एनालिटिक्स का उपयोग करके खराब होने के जोखिम, स्टॉक संबंधी विसंगतियों या अनुपालन की कमियों से जुड़े पैटर्न की पहचान करने हेतु किया जा सकता है ताकि शीघ्र और अपेक्षाकृत अधिक जोखिम-आधारित पर्यवेक्षण से जुड़ी कार्रवाई संभव हो सके।

खाद्यान्नों की आवाजाही के दौरान, मार्ग अनुकूलन उपकरणों (‘अन्न चक्र’) का उपयोग करके जहां परिवहन की योजना बनाई जाती है, वहीं व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम (वीएलटीएस) ट्रक की आवाजाही से जुड़े वास्तविक समय में जीपीएस आधारित आंकड़े सृजित करते हैं। राज्यों ने मार्ग अनुकूलन के जरिए लगभग 238 करोड़ रुपये की वार्षिक बचत की है। मार्ग संबंधी योजना भले ही व्यवस्थित है, लेकिन राज्यों में हजारों यात्राओं की निगरानी करना परिचालन संबंधी चुनौतियां पेश करता है। आवागमन संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण करने और बार-बार होने वाले मार्ग विचलन, असामान्य देरी या असामान्य ठहराव को चिह्नित करने के उद्देश्य से एआई-आधारित पैटर्न का पता लगाने और विसंगति की पहचान करने की योजना बनाई जा रही है। ये विश्लेषण निगरानी को मजबूत कर रहे हैं और परिवहन संचालन के अपेक्षाकृत अधिक केन्द्रित सत्यापन को संभव बना रहे हैं।

वितरण वाले चरण में, राज्यों द्वारा रखे गए लाभार्थियों के रिकॉर्ड को स्मार्ट-पीडीएस प्लेटफॉर्म के तहत समेकित किया जाता है। इससे राशन कार्डों का एक एकीकृत राष्ट्रीय भंडार तैयार होता है। यही नहीं, इससे राज्य द्वारा परिभाषित मानदंडों के तहत संभावित रूप से अपात्र कार्डों की पहचान करने हेतु अन्य सरकारी डेटाबेस के साथ सत्यता की पुष्टि (क्रॉस-वेरिफिकेशन) भी संभव हो पाती है। अब तक, इस तरह के सत्यापन के जरिए 8.51 करोड़ राशन कार्डों को चिह्नित किया गया है। इनमें से 2.18 करोड़ कार्डों को राज्य सरकारों द्वारा उचित प्रक्रिया के बाद हटा दिया गया है। हालांकि नामों, पतों, आधार सीडिंग और परिवार की संरचना में विसंगतियां बड़े पैमाने पर नियम-आधारित जांच की प्रभावशीलता को सीमित कर सकती हैं। संभावित नकल, संबंधित पहचानों या परिवारों के असामान्य पुनर्गठन की पहचान करने हेतु मशीन लर्निंग पर आधारित आंकड़ों के मिलान की तकनीकों का उपयोग करने की योजना बनाई जा रही है। इसके परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाले जोखिम संबंधी संकेत राज्यों द्वारा लक्षित सत्यापन में सहायता करेंगे, जिससे मौजूदा पात्रता संबंधी मानदंडों के भीतर सटीकता बेहतर होगी।

लाभार्थियों की शिकायतें सेवाओं की आपूर्ति और अनाज की गुणवत्ता के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देती हैं। शिकायत दर्ज कराने हेतु कई साधन (ऑनलाइन पोर्टल, कॉल सेंटर, व्हाट्सएप और आईवीआरएस सहित) मौजूद हैं, लेकिन शिकायतों की संख्या और भाषाई विविधता के कारण समय पर उनका निपटान और समाधान करना मुश्किल हो जाता है। सरकार ने अन्न सहायता होलिस्टिक एआई सॉल्यूशन (आशा) शुरू किया है, जो बहुभाषी वॉयस आउटरीच और एआई-आधारित विश्लेषण का उपयोग करके लाभार्थियों से व्यवस्थित प्रतिक्रिया एकत्र करता है। स्वचालित वर्गीकरण और भावनाओं के विश्लेषण प्रशासकों के लिए डैशबोर्ड तैयार करते हैं, जिससे प्राथमिकता के निर्धारण और प्रतिक्रिया में लगने वाले समय में सुधार होता है। आशा वर्तमान में प्रति माह लगभग 20 लाख लाभार्थियों तक पहुंचती है और पूरे देश में इसका विस्तार किया जा रहा है।

अंत में, राज्य सरकारें खरीद लागत घटकों से संबंधित सहायक दस्तावेजों के साथ एनएफएसए के लिए सब्सिडी दावे (स्कैन) पोर्टल के जरिए सब्सिडी संबंधी दावों को प्रस्तुत करती हैं। प्रारूप और चेकलिस्ट भले ही मानकीकृत हैं, लेकिन अपूर्ण, बेमेल या अस्पष्ट दस्तावेज के कारण जांच और प्रतिपूर्ति में देरी हो सकती है। दस्तावेजों की प्रासंगिकता, डेटा की निरंतरता और अपलोड की स्पष्टता की पुष्टि करने हेतु एआई-आधारित दस्तावेज सत्यापन और गुणवत्ता मूल्यांकन का उपयोग किया जा रहा है। इससे बार-बार की पूछताछ कम होती है और दावों के निपटारे की प्रक्रिया में दक्षता और निरंतरता बेहतर होती है।

भारत की खाद्य सब्सिडी संरचना ने डिजिटलीकरण के जरिए पहले ही बर्बादी को कम कर दिया है। अगला बदलाव जवाबदेही में निहित है। खरीद, भंडारण, परिवहन, वितरण और दावों के निपटान की प्रक्रिया में एआई को शामिल करके, यह प्रणाली जोखिमों का शीघ्र पता लगाने, त्रुटियों को तेजी से सुधारने और लाभार्थियों को उनका हक समय पर दिलाने में अधिक समर्थ हो जाती है। कुल 80 करोड़ से अधिक लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले इस कार्यक्रम में, अधिक जवाबदेही कोई मामूली सुधार नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा ढांचे की संरचनात्मक मजबूती का प्रतीक है।

(लेखक खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के सचिव हैं)

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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