संगठन सृजन बनाम बड़े नेताओं का कोटा सिस्टम, खेमेबाजी नज़र आई सामने
छत्तीसगढ़।छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस में संगठन सृजन मॉडल को लेकर पिछले तीन महीनों से चल रही चर्चा अब घोषणाओं के बाद और तेज हो गई है। एआईसीसी ने जिला और शहर अध्यक्षों की नियुक्ति के लिए संगठन सृजन को आधार मानने की बात कही थी। इसके लिए दूसरे राज्यों से पर्यवेक्षक बुलाकर उनसे विस्तृत रिपोर्ट भी ली गई थी। पर्यवेक्षकों ने दावेदारों से बातचीत कर अपने स्तर पर संभावित नाम भी दिल्ली भेजे थे।
लेकिन शुक्रवार रात एआईसीसी के महासचिव केसी वेणुगोपाल द्वारा जारी की गई सूची ने कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को चौंका दिया। घोषित नामों में संगठन सृजन की प्रक्रिया से अधिक गुटीय राजनीति और वरिष्ठ नेताओं का प्रभाव साफ दिखाई दिया। रायपुर से बस्तर तक और बिलासपुर से सरगुजा तक सूची देखकर ऐसा प्रतीत हुआ कि प्रदेश के कुछ चुनिंदा नेताओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव बनाए रखते हुए अपनी पसंद के नामों को आगे बढ़ाया।
कांग्रेस कैंप के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि जब नियुक्ति संगठन सृजन के जरिए होनी थी, तब प्रदेश नेताओं के साथ दिल्ली में लंबी बैठकों और मंथन की आवश्यकता क्यों पड़ी। क्या पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया गया? या फिर पर्यवेक्षकों द्वारा सुझाए गए नामों पर सहमति नहीं बनी?
सूत्र बताते हैं कि अंतिम चरण में दिल्ली में हुई बैठकों में प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं का दबदबा अधिक रहा। खासतौर पर पूर्व मुख्यमंत्री और एआईसीसी महासचिव भूपेश बघेल इस प्रक्रिया में राजनीतिक रूप से सबसे अधिक लाभ की स्थिति में रहे।
बिलासपुर में नई सियासी बिसात
जारी सूची के बाद बिलासपुर जिले में भी शक्ति संतुलन बदलता दिख रहा है। भिलाई के एक प्रमुख नेता ने लोकसभा चुनाव के दौरान मिली राजनीतिक बढ़त के आधार पर यहां अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। शहर और जिला अध्यक्ष की नियुक्ति में विधायक देवेंद्र यादव की भूमिका असरकारी रही जिन्हें पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज का सीधा समर्थन मिला।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि आने वाले दिनों में बिलासपुर की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी क्या संगठन देवेंद्र यादव की रणनीति के अनुसार संचालित होगा या स्थानीय नेताओं की सहभागिता भी समान रूप से दिखेगी।
गुटीय समीकरण भी उजागर

शहर अध्यक्ष सिद्धांशु मिश्रा को कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव का करीबी माना जाता है। वे निकाय से लेकर विधानसभा चुनाव तक अटल खेमे की गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं।

जिला अध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री पहले नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत के करीबी माने जाते थे। बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच वे अब देवेंद्र यादव गुट के समर्थन से जिला अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचे हैं।
कुल मिलाकर संगठन सृजन की प्रक्रिया के बीच गुटबाज़ी, कोटा सिस्टम और बड़े नेताओं के प्रभाव की परतें फिर उभरकर सामने आई हैं। नई नियुक्तियों से प्रदेश कांग्रेस के अंदरूनी समीकरण किस रूप में बदलते हैं,इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं।
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