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January 26, 2026 8:58 pm

महासमुंद दोहरा हत्याकांड: हाई कोर्ट ने उम्रकैद की सजा रखी बरकरार

बिलासपुर:हाई कोर्ट ने महासमुंद के बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में आरोपित मां की अपील को खारिज कर दिया है। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति विभू दत्त गुरु शामिल थे, उन्होंने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि भले ही मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, लेकिन वे सभी साक्ष्य आपस में जुड़कर एक ऐसी अटूट श्रृंखला बनाते हैं, जो आरोपित को दोषी साबित करने के लिए पर्याप्त हैं।
घटना 20 दिसंबर 2017 की है। महासमुंद जिले के लमकेनी गांव निवासी शिक्षक जनकराम साहू ने पुलिस को सूचना दी कि उनके किराएदार ईश्वर पांडे की पत्नी और बेटियां घर के अंदर खून से लथपथ पड़ी हैं। पुलिस जब मौके पर पहुंची, तो दोनों बेटियां मृत मिलीं, जबकि उनकी मां यमुना देवी गंभीर रूप से घायल अवस्था में मिली। घटनास्थल से चाकू, ब्लेड, मोबाइल फोन, सुसाइड नोट और अन्य खून से सने साक्ष्य जब्त किए गए।

पुलिस ने महिला को अस्पताल में भर्ती कराया। उपचार के दौरान उसके बयान लिए गए, जिनमें उसने स्वीकार किया कि उसने ही अपनी दोनों बेटियों की हत्या की और फिर खुद आत्महत्या करने की कोशिश की। उसने यह भी बताया कि उसका वैवाहिक जीवन छह वर्षों से अशांत था और पति तथा बेटियां उसे लगातार मानसिक यातना देती थीं। इसी कारण वह अवसाद में थी और उसने यह कदम उठाया।
18 मार्च 2021 को महासमुंद के प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने महिला को दोषी करार देते हुए आइपीसी की धारा 302(2) (हत्या) और धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
महिला की ओर से दायर अपील में कहा गया कि वह स्वयं मानसिक रूप से अस्थिर और वर्षों से प्रताड़ित थी। उसके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं था और वह खुद भी इस घटना की शिकार रही है। राज्य की ओर से प्रस्तुत तर्कों में कहा गया कि, घटनास्थल पर साक्ष्य मिले हैं, सुसाइड नोट बरामद हुआ है, मेडिकल रिपोर्ट है और स्वयं महिला का बयान भी है, इन सभी से यह स्पष्ट होता है कि यह कृत्य उसी ने किया था। हाई कोर्ट ने माना कि यह पूरा मामला भले ही प्रत्यक्षदर्शियों से रहित है, पर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला इतनी सशक्त और सुसंगत है, कि वह किसी भी प्रकार के संदेह से परे अपराध को साबित करती है। इसलिए सजा में हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।

रवि शुक्ला
रवि शुक्ला

प्रधान संपादक

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