बिलासपुर। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा की परंपरा बिलासपुर में दशकों से श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जा रही है। शहर के चार प्रमुख जगन्नाथ मंदिर रेलवे परिक्षेत्र, सदर बाजार स्थित पाराशर मंदिर, जूना बिलासपुर का सीताराम मंदिर और गोंड़पारा का दर्जी मंदिर आज भी अपनी-अपनी प्राचीन परंपराओं के अनुरूप रथयात्रा का आयोजन करते हैं। कहीं भक्त रस्सियों से रथ खींचते हैं तो कहीं बैलगाड़ी या सुसज्जित वाहन में भगवान की शोभायात्रा निकाली जाती है।
रेलवे परिक्षेत्र मंदिर में 1996 से निभाई जा रही परंपरा
रेलवे परिक्षेत्र स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर की स्थापना 26 नवंबर 1996 को हुई थी। मंदिर स्थापना के साथ ही यहां भव्य रथयात्रा उत्सव की शुरुआत हुई। मंदिर में पूजा-पद्धति, स्नान यात्रा, रथ महोत्सव और नवकलेवर जैसे सभी प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान पुरी श्रीजगन्नाथ मंदिर की परंपरा के अनुरूप संपन्न किए जाते हैं।
स्थापना समारोह में पुरी के गजपति महाराज दिव्य सिंह देव और श्रीमंदिर के मुख्य पंडा रमेश राजगुरु विशेष रूप से शामिल हुए थे। वर्ष 2015 में यहां पहली बार पुरी की तर्ज पर नवकलेवर महोत्सव आयोजित किया गया, जिसमें भगवान के ब्रह्म परिवर्तन की प्रक्रिया पुरी से आए सेवायतों के मार्गदर्शन में संपन्न हुई।
मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की महानीम की लकड़ी से निर्मित प्रतिमाएं स्थापित हैं, जिन्हें प्रसिद्ध शिल्पकार गजेंद्र महाराणा ने तैयार किया था। भगवान जगन्नाथ यहां महाबाहु स्वरूप में विराजमान हैं, जो अपने भक्तों का खुले हाथों से स्वागत करने का संदेश देते हैं।
पाराशर मंदिर में तीन शताब्दियों से जीवित है परंपरा
सदर बाजार स्थित पाराशर मंदिर को शहर का सबसे प्राचीन जगन्नाथ मंदिर माना जाता है। मंदिर की देखरेख कर रहे दुबे परिवार के अनुसार इसकी स्थापना लगभग 300 वर्ष पूर्व पंडित पाराशर दुबे ने की थी और वर्तमान में उनकी सातवीं पीढ़ी इसकी सेवा कर रही है।
मंदिर से केवल गुंडिचा यात्रा निकाली जाती है। पहले यह यात्रा बैलगाड़ी से निकलती थी, जबकि अब सजे हुए वाहन में भगवान की शोभायात्रा निकाली जाती है। वर्ष 1980 में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया, लेकिन गर्भगृह और प्राचीन विग्रहों को यथावत रखा गया। परिवार का दावा है कि बिलासपुर में रथयात्रा की शुरुआत इसी मंदिर से हुई थी।
जूना बिलासपुर में आज भी बैलगाड़ी बनती है रथ
जूना बिलासपुर स्थित सीताराम मंदिर में पिछले 75 से 80 वर्षों से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की पूजा पुरी की परंपरा के अनुसार की जा रही है। पहले यहां लकड़ी के भव्य रथ में यात्रा निकलती थी, लेकिन रथ के क्षतिग्रस्त होने के बाद पिछले करीब 20 वर्षों से बैलगाड़ी को सजाकर रथयात्रा निकाली जा रही है। मंदिर में स्थापित विग्रह महानीम की लकड़ी से निर्मित हैं।
दर्जी मंदिर में काष्ठ विग्रहों के साथ निकलती है रथयात्रा
गोंड़पारा स्थित लगभग 100 वर्ष पुराने दर्जी मंदिर में भी प्रतिवर्ष भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की रथयात्रा निकाली जाती है। गर्भगृह में स्थापित पत्थर की प्रतिमाओं को स्थानांतरित नहीं किया जा सकता, इसलिए रथयात्रा के लिए विशेष रूप से काष्ठ विग्रहों का उपयोग किया जाता है। भजन-कीर्तन और श्रद्धालुओं की सहभागिता के साथ निकलने वाली यह शोभायात्रा आज भी मंदिर की प्राचीन धार्मिक परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।
आषाढ़ मास का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ मास भगवान जगन्नाथ का अत्यंत पवित्र महीना माना जाता है। इसी माह में रथयात्रा, भगवान का प्राकट्य और नवकलेवर जैसी महत्वपूर्ण परंपराएं संपन्न होती हैं। अधिकमास (दो आषाढ़) आने पर नवकलेवर महोत्सव आयोजित किया जाता है, जिसमें भगवान के विग्रहों का पारंपरिक विधान के अनुसार परिवर्तन किया जाता है। बिलासपुर के इन मंदिरों में भी इन परंपराओं का निर्वहन श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किया जाता है।
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