बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने पदोन्नति से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में साफ कहा है, योग्यता-सह-वरिष्ठता के सिद्धांत में पहले उम्मीदवारों की योग्यता का तुलनात्मक मूल्यांकन करना अनिवार्य है। केवल वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति देना कानून के विरुद्ध है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने अपनेआदेश में कहा है, वरिष्ठता का उपयोग केवल तब किया जा सकता है, जब उम्मीदवारों की योग्यता वास्तव में बराबर पाई जाए।
अपीलकर्ता वर्ष 1994 में जेल अधीक्षक के पद पर नियुक्त हुआ था। राज्य शासन ने वर्ष 2000 में कैडर में शामिल किया। प्रतिवादी अधिकारी वर्ष 2009 में सेवा में आया। वर्ष 2023 में उप महानिरीक्षक DIG जेल के पद पर पदोन्नति के लिए विभागीय पदोन्नति समिति DPC की बैठक हुई। DPC ने बहुत अच्छा वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन ACR के आधार पर दोनों को योग्य मानते हुए अपीलकर्ता को पदोन्नति के लिए चुन लिया। बाद में प्रतिवादी ने सूचना के अधिकार कानून के तहत DPC की कार्यवाही और एसीआर विवरण प्राप्त कर यह दावा किया, उसकी प्रविष्टियां अधिक उत्कृष्ट थीं। प्रतिवादी अधिकारी की आपत्ति यह कहकर खारिज कर दी गई कि रिक्ति उपलब्ध नहीं है, जबकि अपीलकर्ता को पदोन्नति मिल चुकी थी।
राज्य शासन के फैसले के बाद प्रतिवादी अधिकारी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की। मामले की सुनवाई सिंगल बेंच में हुई। सुनवाई के बाद सिंगल बेंच ने याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य शासन द्वारा पदोन्नति आदेश को रद्द कर दिया। सिंगल बेंच के फैसले को प्रतिवादी अधिकारी ने डिवीजन बेंच में चुनौती देते हुए याचिका दायर कर। याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई।
याचिका की सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने पाया, DPC ने सभी उम्मीदवारों को केवल समान ग्रेडिंग के आधार पर बराबर मान लिया और उनकी योग्यता का तुलनात्मक मूल्यांकन नहीं किया। इसके बाद केवल वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति के लिए नाम तय कर लिया, जो कि नियमों का उल्लंघन है।
डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा, योग्यता प्रमुख आधार होना चाहिए और वरिष्ठता केवल टाई-ब्रेकर के रूप में ही लागू हो सकती है। डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा है, DPC द्वारा योग्यता का समुचित आकलन न करना पदोन्नति प्रक्रिया को मनमाना और अवैध बनाता है। हाई कोर्ट ने सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज की।
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