अतिथि लेखक से कथित दुर्व्यवहार, विश्वविद्यालय प्रशासन पर उठे सवाल
बिलासपुर।गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान कथित रूप से अतिथि अपमान की घटना सामने आने के बाद राज्यभर के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों में रोष व्याप्त है। इस प्रकरण को लेकर बिलासपुर के लेखकों, सांस्कृतिक कर्मियों और प्रबुद्ध नागरिकों ने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति को पत्र लिखकर कुलपति डॉ. आलोक कुमार चक्रवाल के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 7 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय में समकालीन हिंदी कहानी विषय पर एक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध कथा लेखक मनोज रूपड़ा को आमंत्रित किया गया था।

आरोप है कि कार्यक्रम के दौरान कुलपति द्वारा मुख्य अतिथि के साथ कथित रूप से अपमानजनक व्यवहार किया गया और उन्हें कार्यक्रम छोड़ने के लिए कहा गया। घटना के बाद यह मामला साहित्यिक और अकादमिक जगत में चर्चा का विषय बन गया है।
राज्यपाल को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान में अतिथि विद्वानों और रचनाकारों का सम्मान संस्थागत संस्कृति का अभिन्न हिस्सा होता है। ऐसे में विश्वविद्यालय के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति द्वारा इस प्रकार का व्यवहार न केवल शिष्टाचार के विरुद्ध है, बल्कि पूरे साहित्यिक समाज के सम्मान पर आघात करता है।
पत्र में की गई प्रमुख मांगें

जनसंस्कृति मंच सहित विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संगठनों द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में राज्यपाल से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है। पत्र में कहा गया है कि—
• कुलपति पद पर रहते हुए इस तरह का कथित अमर्यादित व्यवहार विश्वविद्यालय की साख और अकादमिक गरिमा को ठेस पहुंचाता है।
• मामले का संज्ञान लेते हुए महामहिम राष्ट्रपति केंद्रीय विश्वविद्यालयों की विजिटर से कुलपति को पद से हटाने की अनुशंसा की जाए।
• पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रपति को औपचारिक ज्ञापन भी भेजा गया है।
साहित्यकारों में बढ़ता असंतोष
इस पत्र पर छत्तीसगढ़ के कई साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने हस्ताक्षर किए हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं का कहना है कि यदि विश्वविद्यालयों में वैचारिक संवाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अतिथियों का सम्मान सुरक्षित नहीं रहेगा, तो इसका प्रतिकूल प्रभाव शिक्षा व्यवस्था और आने वाली पीढ़ी पर पड़ेगा।
बुद्धिजीवियों का मानना है कि यह मामला केवल एक कार्यक्रम या व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्वविद्यालयों में बढ़ते प्रशासनिक हस्तक्षेप और अकादमिक स्वतंत्रता के क्षरण की ओर संकेत करता है। यदि समय रहते इस पर कार्रवाई नहीं की गई, तो इससे विश्वविद्यालय का शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो सकता है।
फिलहाल, इस पूरे मामले पर विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जबकि साहित्यिक हलकों में यह मुद्दा लगातार तूल पकड़ता जा रहा है।
प्रधान संपादक

