छत्तीसगढ़ी साहित्य में डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा के  योगदान  को लेकर श्रीमती साधना शर्मा की वार्ता का प्रसारण आकाशवाणी बिलासपुर में आज शाम 5.05 बजे 

 

छत्तीसगढ़ी साहित्य के आधुनिक रुप सन् 1900 से माने जाथे फेर दूसर उन्मेष काल सन् 1955 से वि‌द्वान मन स्वीकार करर्थे । तभो कहे च बर परही के छत्तीसगढ़ी भाषा में रायपुर अंचल के शब्द मन के जोर रहिस। अइसन समय में बिलासपुर के डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा ध्वन्यात्मक शब्द से सजे, पैरी के रुन झुन सुनावत बोली भाषा ले के आइन ।” नांव के नेह मं” कहानी लिखिन त बिलसिया केंवटिन अउ बिलासपुर के संबन्ध उजागर होइस । उन लोक कथाकार अउ शिष्ट कथाकार के संधि स्थल माने जायें काबर के उंकर रचना में कृषि संस्कृति अउ ऋषि संस्कृति संग लोक जीवन, लोक परम्परा, लोक मानस के सुख दुख के वर्णन बड़ सहजता से लिखे मिलथे। तभो कहे च बर परही के सनातन धर्म ऊपर अगाध विश्वास होते हुए भी उन सांप्रदायिकता ले परे रहिन ।

सन् 1973 मं उन ” कृषक जीवन की शब्दावली ” ऊपर पी एच डी करिन जेहर ए बात के उदाहरण आय के उन छत्तीसगढ़ के माटी के मितान किसान अउ किसानी ऊपर कतका भरोसा करयं । छत्तीसगढ़ के खेती के औजार पाती, माटी, धान के प्रकार सबो के वर्णन है।

छत्तीसगढ़ी साहित्य मं डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा के योगदान ल सुरता करे के बेरा सबले पहिली ” सुसक झन कुररी सुरता ले ” के चर्चा होही। कुररी जेला क्रौंची कहिथन ओकरे करुणा विगलित स्वर हर तो वाल्मीकि ल रामायण लिखवा देहे रहिस त नारी मन के बिथा पीरा, समाज में दोयम दर्जा, उवत ले बूड़त हाड़ तोड़ मेहनत घलाय जिन मन ल कभू सराहना नइ देवाय सकिस उही नारी मन के सुसकी हर तो डॉ. शर्मा के मन ल बेध डारिस । अढ़ाई आखर, नून के करजा, सुन्ना मंदिर, धन्न रे लीला, अवगुन चित न धरो असन कहानी ये संग्रह में संग्रहित हैं।

सबो कहानी के भाषा गुरतुर गोठ के सुरता कराथे ।

” तिरिया जनम झनि देय” सुसक सुसक के थक गए नारी मन के सुसकी समाज के कान में परबे नइ करिस.. न मड़के न ससुरार के कोनो बाबू लड़का मन के हृदय पसीजिस भलुक नोनी लड़का मन पढ़ लिख लिन त नौकरी करे निकलिन तभो घर दुआर के काम बूता, लड़का लोग के देख रेख, सियान सियानिन के सेवा तो करेच बर परथे कहे जा सकत हे के दोहरी जिम्मेदारी निभाये लगिन । कथाकार के कलम लिखिस तिरिया जनम अति कल्पना, सेजिया परे उपास, मोर सोहागिन नांव, गोरसी के गोठ, दियना हांसय आधी रात, सती के नाम पर आदि ..।

ये दुनों कहानी संग्रह में 17 झन नारी हृदय के कलपना, उनमन के सुसकना, बिथा पीरा बगरे हे जेला पढ़त पढ़त पथरा के मूरति के आंखी ले घलाय आंसू बोहाए धर लेही। छत्तीसगढ़ी साहित्य मं स्त्री विर्मश के शंखनाद करड्या इही दुनों कृति हर आय।

सुरुज साखी हे ” किताब छत्तीसगढ़ी निबंध के मील के पथरा कहे जा सकत है काबर के एमा ललित निबंध सकलाये हे।

ललित माने तो प्रिय, कोमल, रमणीय होथे न? फेर शब्द, वर्णन शैली गुरतुर भाषा हर कविता के सुरता कराये जेला कहि सकत हन गद्य गीत …। छत्तीसगढ़ के सपना सुरुज साखी हे घठौन्धा के पथरा देख रे आंखी, सुन रे कान, नवा सुरुज ल पधरावा असन ललित निबंध मन अवड्या पीढ़ी के निबंधकार मन बर कंडील साबित होइस । लोकोक्ति, मुहावरा संग ध्वन्यात्मक शब्द मन के प्रयोग ये संग्रह के सबले बड़े विशेषता आय ।

डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा के नज़र समाज में बगरे विसंगति, सामाजिक, राजनैतिक गतिविधि मन ऊपर भी परत रहिस त उंकर कलम लिखतिस कइसे नहीं.. लिखिस” गुड़ी के गोठ”

नवभारत अखबार में तीन साल धारावाहिक चलिस गुड़ी के गोठ त पाठक ल गुने बर पर गिस ये कोन लिखत हे जेहर समाज ल दर्पण देखावत हे। गुड़ी माने चौपाल जिहां मनसे जुरर्थे त अपन दुख संग देश काल समाज, राज, दीन दुनिया के दुख सांसत संग राजा मंत्री सबके आलोचना होथे। एक तरह से गुड़ी ल समाचार केंद्र कहि सकत हन । टी वी के गुन दोष, वोट काला अउ काबर दिन, अकाल दुकाल, सुरसा के मुंह कस बढ़त मंहगाई, दाइज डोर के चलते घर में बइठे नोनी, नौकरी बर सिसियाए किंदरत जवान लड़का मन, आज के शिक्षा अउ अंग्रेजी के बोलबाला, बिलासपुर टेसन के बंदरा बिनास असन कतको समस्या गुड़ी के गोठ मं सकलाये हे त पाठक ल गुने बर पर जाथे सही मं साहित्य हर समाज के दर्पण तो आय ।

डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा शब्द संधानी कहे जाथे छत्तीसगढ़ी शब्द के उत्तपत्ति फेर ओकर व्याख्या करे के अद्भुत क्षमता उन मं रहिस.. तभे तो 2001 मं” हिंदी छत्तीसगढ़ी शब्दकोश” पाठक के हाथ में पहुंचे सकिस ।

छत्तीसगढ़ी साहित्य उंकर योगदान ल कभू भुलाए नइ सकय ।

A-35 श्याम परिसर विद्या नगर बिलासपुर

रवि शुक्ला . निर्मल माणिक

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